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बुद्ध-चरित / कविता भट्ट

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लेखनी उठी बुद्धचरित लिखने
मौन और विदीर्ण लगी दिखने।

अब बुद्ध पूर्णिमा अवसान पर है,
लेखनी की दृष्टि युग-ध्यान पर है।

वह अब पीड़ा लिखने को आतुर,
देख रही मरते बुद्ध मानव-भीतर।

मोह में रमा हुआ सिद्धार्थ- आज
देखता मात्र अपने ही सुख-साज।

दुःख न दे सिद्धार्थ को वृद्ध पीड़ा,
विचलन नहीं, मृत्यु लगती क्रीड़ा।

जो दूजे की पीड़ा से विचलित था,
सुख में हो भी दुःखी-उद्वेलित था।

दूर की कौड़ी है, आत्म-विश्लेषण,
तिल-तिल मरता बुद्ध, हुआ क्षरण।

यह युग अब आत्म-प्रवंचन का,
विरक्ति नहीं, भौतिक मंचन का।

सिद्धार्थ भाव छोड़ बुद्ध उभरेगा,
क्या प्रपंची मानव स्व-रूप धरेगा? ......