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बूंद बन बन के बिखरता जाये / शीन काफ़ निज़ाम

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बूंद बन बन के बिखरता जाये
अक्स आईने को भरता जाये

बन के कल कल जो गुजरता जाये
अपने वादे से मुकरता जाये

एक ही लय में बहे जाता है
और लगता है ठहरता जाये

शहर सागर का भी हमजाद कंहा
मौज-दर-मौज बिफरता जाये

अक्स माकूस हुआ है जब से
अपनी नजरों में उतरता जाये

एक नदी है कि रूकती ही नहीं
एक तूफान उतरता जाये

एक कोंपल में सिमटने के लिये
पेड़ का पेड़ बिखरता जाये