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बूंद / गौतम अरोड़ा

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ले आव,
उछालां भाटौ,
करां आभै बादळी खाडो,
काढण नै हिस्सै रो पाणी,
थूं हाथ दे, म्हैं देवूं हूंस।
मत देख,
आभै अर थारै बिच्चै रै आंतरै नै
मत भूल,
थारै अर म्हारै बिच्चै भी हो पीढ़ीयां रो आंतरौ,
अर ऊभा,
आज एक जमीं, एक काज सारू
थूं, पीढीयां तिरसो
अर म्हैं, उणरै पाणी सूं बेराजी
थूं, टोपो-टोपो तरसै
अर म्हैं खिडांऊं उणरौ लोटो
मत सोच, कर मन, उठा भाटौ
ओ आभौ, आ बादळी
थारै ईज सारू।
हां मालकां
सुक्कै हौठ, रीतै पेट
म्है ऊभौ आपरी जमीं, खडूं उणनै
जोऊं
आपरै हाथ भरयै थाळ
अर
आभै री धोळी बादळी,
मालकां
ऊभा एक जमीं,
पण आभै लम्बै आंतरै सागै
म्हैं, जोवणी चावूं
बादळी लारली दुनियां
अर आप, कब्जै करणों चावौ आभौ
म्है, चळू कर सोवण चाऊं
अर आप, उडावणी चावौ नींद
नीं मालकां नीं
नीं सूंप सकूं औ आभौ
बादळी सूं खोस अंधारै नै
इण सारू ईज
छोड कांकरो,
लियो भाटौ हाथ
खोदण नै जमीं
काढूंला, म्हारै हौठां सारू,
म्हारै हिस्सै री ‘बूंद’
ऊंडै पाताळ सूं।