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बूथ बाला / सुधीर कुमार 'प्रोग्रामर'

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की बतलैहौन हाल-चाल हो, कानऽ के निनौन छै
चलतें-फिरतें, खैतें-पीतें जखनी-तखनी फोन छै।

टन-टन, ट्रिंग-ट्रिंग, टें-टें-टें-टें कखनू घनघन फोन छै
जखनी हमरा काम पड़ै छै, गायब डायल टोन छै।

एक के साथें तीन ठों अैथौन ठंढ़ा, पुड़िया ले फरमैथौन
कोय गप करथौन फुसुर-फुसुर कं कोय चिकरी-चिकरी बतियैथौन।

प्रेम-मुहब्बत, मरनी-हरनी, बीहा-शादी, सूती-खादी
सोना-चॉदी, तेजी-मंदी, पुलिस-दरोगा, कैदी-बंदी।

सास-पुतोहू, ननद-भौजाय, गोतिया-लैया, झगड़ा-लड़ाय
शाला-शाली, बीबी-बच्चा, आधा झुठा, आधा सच्चा।

कैसन चललऽ छै रेबाज, भीतर दिल के खोलै राज
बोलै बाला मस्त-मस्त छै, सुनबैया कं लागै लाज।

लाख लीख के गप-शप करथौन, लेकिन हमरो बील उधार
जों फोनऽ के पैसा मांगौ उ दिन सें दोसरा के द्वार।

के मानतै हमरऽ बातऽ केॅ, सब ते एकदम मौन छै
की बतलैहौन हाल-चाल हो, कानऽ के निनौन छै।
जखनी हमरा काम पड़ै छै गायब डायल टोन छै।