भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

बेंदी / जगदीश गुप्त

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

उगी गोरे भला पर बेंदी!
एक छोटे दायरे में लालिमा इतनी बिथुरती,
बांध किसने दी।

नहा केसर के सरोवर में,
ज्यों गुलाबी चांद उग आया।
अनछुई-सी पाँखुरी रक्ताभ पाटल की,
रक्तिमा जिसकी, शिराओं के
सिहरते वेग में,
झनकार बनकर खो गई।
भुरहरे के लहकते रवि की
विभा ज्यों फूट निकली,
चीरती-सी कोर हलके पीत बादल की,
रात केशों में सिमटकर सो गई।
अरुन इंदीवर खिला, ईंगूर पराग भरा
सुनहले रूप के जल में
अलक्तक की बूंद
झिलमिल : स्फटिक के तल में।