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बेकहे भी न रहा जाय, और क्या कहिये! / गुलाब खंडेलवाल


बेकहे भी न रहा जाय, और क्या कहिये!
प्यार इसको न कहा जाय, और क्या कहिये!

जो भी कहिये, यही लगता है कुछ भी कह न सके
और चुप भी न रहा जाय, और क्या कहिये!

दर्द अपना उन्हें ग़ज़लों में कह रहे हैं गुलाब
जिनसे यह भी न सहा जाय, और क्या कहिये!