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बेचारा मर्द / उज्ज्वल भट्टाचार्य

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मां के गर्भ से निकलने के बाद से ही
वह परेशान है
छूट चुका है
उसका बसेरा
जहां उंकड़ू मारकर
घर जैसा महसूस किया जा सके
अब हाथ-पैर फैलाने हैं
धरती-आसमान-समंदर
हर कहीं बनाने हैं बसेरे
डाह भरी नज़रों से
वह देखता है औरत को
उसे बसेरे नहीं बनाने हैं --
बसेरा बनना है !