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बेटियाँ / किरण मल्होत्रा

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बेटियाँ
मन का वह
कोमल हिस्सा होती
जहाँ असहनीय होता
कुछ भी सहना

जरा सी वेदना
रूलाती ज़ार-ज़ार
विश्व सम्राट पिता को

बेटियों के
प्रेम में बंधा मन
करता व्याकुल

हो जाता जैसे
पल में पराजित
सुलगता
मंदिर की धूनी-सा
जब देखता
खिली धूप-सी
बेटी की
ठहरी सूनी आँखें