Last modified on 27 जनवरी 2017, at 20:46

बैल बियावै, गैया बाँझ / 31 / चन्द्रप्रकाश जगप्रिय

सियारंे शेर सेॅ पूछलकै-
आदमी लुग
कोॅन किसिम के संविधान छै?
शेरें कहलकै-
जैमेॅ रोज-रोज
हेरा-फेरी करै छै
अपनोॅ मोॅन लायक बनावै छै
होने संविधान छै।

अनुवाद:

सियार ने शेर से पूछा-
आदमी के पास
कौन सा संविधान है
शेर ने कहा-
रोज-रोज ‘उसमें’
हेरफेर करता है
अपने मन लायक बनाता है
वैसा संविधान है।