भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

बोनसाई / दामिनी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

 मैं बरगद थी,
विशाल बरगद
इस रास्ते के किनारे पर
जो मेरे सामने से होकर
गुजर जाता है,
मैंने युगों तक
तुम्हारी प्रतीक्षा की थी
और एक दिन तुम आए।
तुम सफर की थकान से चूर थे
तुम्हारे कंधे तुम्हारे ही बोझ से झुके हुए थे
मेरी छाया में तुमने
अपनी थकान मिटाई,
मेरे ओस से भीगे हुए पत्तों से
तुमने अपनी प्यास बुझाई
मेरी जटाओं में झूलकर
तुमने अपने गम भुलाए
और जब तुम तरो-ताजा हो
उठ खड़े हुए हुए तो जाने क्यों
मेरे कद की ऊंचाई
तुम्हें नापसंद आई।
तुमने खुद को एक
तरकीब सुझाई,
अपनी गहरी चमकीली आंखों से
मुझेे देख कर अपनी बांहें
मेरी तरफ फैलाई,
मैं भी युगों की प्रतीक्षा के बाद
थक चुकी थी।
उन बांहों में आराम पाना चाहती थी,
सुस्ताना चाहती थी,
सो अपने वजूद को मैंने
तुम्हारी बांहों के दायरे में समेट दिया।
वाकई, तुमने मेरे वजूद को एक खूबसूरत जगह दी
चौराहे की बड़ी-सी चौपाल से उठा के
रख दिया
अपने ड्राइंग-रूम के कोने में
क्योंकि,
अब मैं विशाल बरगद नहीं
बल्कि बोनसाई बन हूँ।