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बोलियाँ ही चुप रहीं तो / विपिन सुनेजा 'शायक़'

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बोलियाँ ही चुप रहीं तो चुप्पियाँ बोलेंगी क्या
खिंच गयी जिनकी ज़बां मजबूरियाँ बोलेंगी क्या

ख़ून होता देखने वाले ही जब बोले नहीं
लाख चीरो लाख जाँचो, अर्थियाँ बोलेंगी क्या

तुम कहाँ इन्साफ़ की उम्मीद ले कर आ गये
आदमी तो बोलते भी, कुर्सियाँ बोलेंगी क्या

किस समय पर्दा उठेगा, नाच होगा कौन सा
पूछना बेकार है, कठपुतलियाँ बोलेंगी क्या

मंच पर आओ सभी के सामने सच बोल दो
अब भी कुछ लोगों को भ्रम है लड़कियाँ बोलेंगी क्या