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भरथरी लोक-गाथा - भाग 10 / छत्तीसगढ़ी

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

भरथरी के ओ
सेना ल देखत हे गुरु
भीख ले आवय ओ
मगन हो गए गुरु
बेटा कहिके मोला
का दिये बहिनी बानी ल
मिरगिन के सराप
आज धोवय भरथरी ये
बानी बोलत हे राम गुरु के चरण म का गिरय, रामा ये दे जी।

छय आगर छय कोरी सेना ल
बइरी देखत हे राम
का तो डतरी जनम लेवय
गुरु गोरख के ओ
सेवा म बईया लगावत हे
दस लाख हाथी का तो जंगल में छोड़त हे
मोर देवत हे राम
ये दे मोहतिया ल दाने म
जतका धन ये ओ हाथी में लदाय
मोर हीरा ये ओ
का तो देवत हावय बाम्हन ल
जोगी देवत हे राम
छय आगर छय कोरी नारिन ये
जोग साधत हे ओ
गुरु गोरखनाथ के चेलिन न
मोर बनावय हीरा
रंगमहल के जतका ओ
मोर चेरिया ल ओ
चेलिन बना देवय
गुरु के चरन म राम
अइसे बानी ल हीरा बोलय राम, रामा ये दे जी।

अतका ल देखत हे गुरु ये
गोरखनाथ ये ओ
धुनि म का बइरी बइठे हे
भरथरी ल राम
धुनि के बानी बताये ल
तिलकसार म ओ
गद्दी म को तो बइठ जावय
गुरु गोरखनाथ
सुन्दर बानी ल बोलत हे
सुन राजा मोर बात
जोग रे साधत हव आज तुमन
जीत होही तुॅहार
पांच पिताम्बर गोदरी
मोती रतन जटाय
आज सऊँप देवव तोला ग
ये दे चिमटा ल ओ
दंड कमंडल ल का देवॅव
गुरु के बानी ये राम जेला सीखे बर का परय, रामा ये दे जी।

सुनले राजा मोर बात
बानी बोलय गुरु गोरख हर
बारा साल ले ग
बइरी भिक्षा ल तुम माँगव
अइसे बानी ल न
गुरु गोरखनाथ ह बोलत हे
का करँव भगवान
विधि के लिख्खा हर नई टरय
रानी सामदेई ये ओ
गुरु के चरन म गिरत हे
सुन गुरु मोर बात
कच्चा कुआँरी के ऊमर
रही जातेंव गुरु
ना तो दुःख बइरी मय पातेंव
आज होगीस बिहाव
जोग साधव
मोर जोड़ी ल
मोला दे दव बताय
कइसे विधि ल बहरी मॅय जियॅव
जिन्दगी म मोर सुख बइरी नइ तो लिखे हे, गुरु ये दे जी।

का तो बात के पराई ये
मोर छाती के ओ
देखतो दीदी पराऊल ये
कइना रोवत हे राम
देख तो दीदी सामदेई हर
परगे गुरु गोहार
देख जंगल के पैरो में
रानी रोवत हे राम
बानी बोलत मोर गुरु ल
सुनले गुरु मोर बात
गुरु गुरुआइन तुम छोड़व
जोड़ी लेहव हमार
का धन करॅव उपाय ल
नई तो सुख ये ओ
मोर करम म लिखे ना
मोला देता बताय अइसे बोलत हे बानी ल, रामा ये दे जी।

चुटकी मारय गुरु गोरखनाथ
गोरखनाथ ये ओ
रानी ल का समझावत है
सुन रानी मोर बात
पति के सेवा ओ तुम करव
जेमा होहय नाम
अइसे बोलत हावय गुरु हर
सुनले रानी मोर बात
पति के सेवा म सुख पाहा
पति रहि तुम्हार
जोग साधय भरथरी हर
जोग होहय ओ आज
जोगी के साथ बइरी तुम रहव
अतका बानी ल ओ
का तो कइना ये दे सुनत हे, भाई सुनत हे, रामा ये दे जी।

गुरु के बानी ल सुनिके
भरथरी ये राम
पईंया लागत हावय गुरु के
माथा टेकत हे ओ
गुरु गोरख के चरणों में
बानी बोलत हे न
पीत पिताम्बर के गोदरी
टोपी रतन जटाय
काने जनेऊ ये
हाथ खप्पर ये गा
जेला देवत हे गुरु ह
भरथरी ल आज भिक्षा माँगन चले जावत है, रामा ये दे जी।

का तो डहर म नदी परय
जोगीन बइठे हे दाई ओ
जोगी चले जावय रद्दा म
का तो डहर म जोगी ठाढ़े
जोगीन बइठे हे दाई ओ
का तो डहर म
नदिया आये हे राम
जेमा भरी पूरा चलत हे
का तो करॅव उपाय
कइसे बइरी नदी नहकॅव
कइसे जाहॅव देस
कौरु कमंछल के नगरी
नैना रानी जिहाँ
भारी जादू ल जानय गा
कइसे जीतॅव मॅय
राजा अइसे अ सोचत हे
जेला देखत हे न
बइठे तीर म
जोगीन न
सुनले राजा मोर बात
कहां जाइके तुम धरना धरेंव, रामा ये दे जी।

गुरु गोरखनाथ के
मोर बानी ये जोगिन ओ
जावत हॅव कामरु देश मँ
जोग साधे ल ओ
गुरु गोरखनाथ के बात ल
घर के रेगेंव कइना
बीच मँ नदी-नाला परे
कइसे होहॅव पार
मने मन म बइठे सोचत हव
ये दे बात ल राम
जेला सुनत हावय जोगीन न
का तो बानी बोलय महराज
का तो बोलत हावय जोगीन ये
सुनले राजा मोर बात
गढ़ उज्जैन मँ राजा भरथरी हावय
जेकर रानी ये गा
सामदेई जेकर नॉव ये
जेकर सुमरन ओ कर लिहा
नदी हो जाहा पार
तेकर पाछू अ बोलत हे
पाहा कारी नाग
सुमरिहा सामदेई ल
मुँह हो जाही बंद कारी नागिन के
जेकर आगू म ओ
बइठे हे नैना रानी ये
जहां परी के भेष देवता धरे
जिहां बइठे हे, रामा ये दे जी।

सुनत हे वचन राजा ये
मोर जोगी ये दाई ओ
का तो सुमिरन ल करय
सामदेई ल आज
सामदेई के सुमिरन करय
नदी के पूरा अटाय
सुक्खा पर जावय नदिया हर
भरथरी ह आज
देख तो दीदी
कइसे नाचत हे
नाच के होवत हे पार
ठउके डहर मँ बइठे रहय
मोर नागिन ये ओ
मुँह ल खोलत हे
दौड़त हे
ये दे चाबेला राम
भरथरी देख के भागत हे
सुरता आवत हे न
सुमरिन करत हे सामदेई के नामे
नागिन के खुले मुंह बंद होई जावे
भरथरी ये ओ
जेकर पाछू रेंगत हे
रेंगना रेंगय राम
कोसे-कोसे के बइरी रेंगना ये
रेंगत हावय
चार अऊ दस कोस रेंगना ये
बीस कोस ये ओ
लगे दरबार परी के गद्दी म बइठे जिहा
पहुचगे भरथरी, रामा ये दे जी।

पीत पिताम्बर गोदरी
टोपी जेमा रतन जड़ाय
काँधे जनेऊ, हाथे खप्पर
दउड़त आवत है भरथरी
परी देखय महराज
सुन ले जोगी हमार
न तो जी तुम ये दे जोग साधव
बानी बोलत हे राम
जऊने ल सुनत हे राजा ये
का करॅव भगवान
जोग बिना के बइरी नई रहॅव
जी हर जाहय हमार
अइसे बानी ल बोलत हे, रामा ये दे जी।

जाके परी के देस में
मारे जावत हे दाई ओ
देवता के पावत हे आदेश
सुनले परी ओ बात
धरके ले आवा तुम जोगी ल
कनिहा कसत हे राम
देख तो परी मन का धरॅय
आघू पाछू म ओ
झूम के तीर म चपक जावॅय
भरथरी ल राम
कइसे विधि के रे मोहत हें
ये के दे डहर म
डहरे म मोहत हे
बानी बोलत हे राम
सुन ले जोगी हमर बाते ल
सुन्दर दिखत हन ओ
ना तो जोगी तुम जोग साधव
कर लव बिहाव हमार संग म बइरी ग तुम रहव, भाई ये दे जी।

मने मन म बइरी गुनत हे
भरथरी ह ओ
का तो जोगी के मैं भेख धरेंव
कहना नई माने राम
अइसन सुघ्घर देख परी हे
मन ल मोहत हे मोर
छल कपट बइरी करत हे
जोग हो जाही मोर
आज अधूर बइरी का रईहॅव
पन म करम हे हार
अइसे विधि बोलिके भरथरी हर ओ
का तो बानी दाई बोलत हे
सुनले कइना मोर बात
ना तो बइरी मय सँग धरॅव
जोग साधिहँव ओ जोग के लागे हे आस, भाई ये दे जी।

अतका बानी ल सुनत हे
मोर परी ये ओ
जाके देवता मेर गोहार पारॅय
पहुँची जावत हे राम
सुन्दर मजा अब बइठे हे
कामरुप कुमार नैन रानी
नैना का मारय
का तो मारत हे राम
सुआ के जादू ल मारत हे
सामदेई ल न
सुमिरन करय भरथरी ये
सुमिरन पावत हे सामदेई
रूपदेई ल
दऊड़त जावय बलाये ल
सुनले बहिनी मोर बात
भांटो तुँहर परय मोर जंगल म
कमरुल-देसे में आज
लेके आवा ओ बचाये ओ, रामा ये दे जी।

सामदेई रूपदेई रानी मन
दूनो आवत हे दाई ओ
कमरु देस में जादू ल
नैना मारत हे न
नैना के बान ल का टोरय
सुवा मारत हे न
सुवा के जादू ल नई चलन देवॅय
बिलाई मारत है ना
बिलाई के जादू ल टोरत हें

मिरगा जादू ये राम
हाथी घोड़ा कर जादू ये
कुकुर बिच्छी के रे
जादू ल टोरत हें
जादू मारत हें राम
देखतो टेटका अऊ मेचका के
मच्छर माछी के न
जम्मो जादू ल बइरी टोरत हे
सामदेई अऊ रूपदेई ये ओ
जऊने ल देखत हे भरथरी, रामा ये दे जी।

कोपे मारे गुस्सा होवत हे
नैना रानी ये दाई ओ
का तो बइरी बानी का बोलय
दूसरा जादू ये
देखतो दीदी का तो छोड़त हे
जऊँहर का दिहा राख
कोप मन गुस्सा होइके जादू छोड़त हे राम
देखतो दीदी कारी चूरी चाऊँर
मोर मारत हे ना
ये दे भेड़िया बना देहॅव
नई तो बोकरा बनॉव
अइसे जादू रानी मारत हे
जादू टोर देवय राम
सामदेई रूपदेई पहुचें हे
ये दे जादू ये राम
घोड़ा के जादू ल मारत हे
जादू टोरय भगवान
का तो विधि बैरी का काटव ओ, रामा ये दे जी।