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भरथरी लोक-गाथा - भाग 2 / छत्तीसगढ़ी

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

का तो भगवान हर महिमा
तोर बुझे ल ओ
ए दे जोगी तोला भेजे हे
झनी जाबे बेटा
मिरगा मार राम
डोंगरी-बहार मा
बघुआ भालू ओ
जिहां रहिथे लाला
मोर हरके अऊ बरजे ल माना ओ
जोगी माना ओ, बाई ये दे जी।

हरके अऊ बरजे ल नई मानय
सुनिले दाई बात
बैकुंठ के भगवाने हर
मोर छले ल ओ
ओहर भेजे दाई
मोला तीर कमंछा ल दे दे ओ
रानी दे दे ओ, रानी ये दे जी।

घोड़ घोड़सार मा जाइके
भरथरी ये ओ
देख तो दीदी घोड़ा साजत हे
बारा भंजन के
बीच अंगना मा ओ
घोरा लाइके न
सम्हरा के गिंया
घोड़ा दुलदुलिया
बारा मरद के, साज के कसे हे न
मोर चिकमिक चिकमिक दिखय ओ
बाई घोड़ा ओ, भाई ये दे जी।

घोड़ा दुलदुलिया ल लाई के
लिलि हंसा घोड़ा
अंगना मं लान खड़ा करत हे
तीर कमंछा दाई
मोला दे देबे ओ
मय हरके अऊ बरजे नई मानव ओ
नई मानव ओ, भाई ये दे जी।

साये गुजर ले उतर के, चले आवत हे ओ
तीर कमंछ ल दे वत हे
भरथरी ये राम
चल धरत हे न
तीर कमंछा ल ओ
मोर घोड़ा मा होय सवार ओ,
सवार ओ, भाई ये दे जी।

आगू-आगू मिरगा दौड़य
जैखर पीछू मा ओ
देख तो दीदी भरथरी ये
सांप सलगनी ओ
दीदी दुरंगिनी न
हरिना के उचार
कुकुर ढुरकी ये ओ
बाग-चोपी ए न
मोर मारत हे मिरगा सपेटा ओ
ये सपेटा ओ, भाई ये दे जी।

जेकर पीछू मा भरथरी
चले जावत हे ओ
देख तो दीदी कुकुर ढुरकी ये
बारापाली के न
पथरा के ओधा
जेमा जाई के न, मोर मिरगा ये न
चल पहुंचत हे राम
मोर छै कोरी छै आगर मिरगीन
चल बइठे हे ओ, भाई ये दे जी।

छै आगर छै कोरी मिरगिन मन
ये दे बइठे हें ओ
काल मिरगा पहुंचगे
सुनिले भगवान
रानी बोलत हे न
सिंघलदीप के ओ
तिलक रानी ये न
सुनिले राजा मोर बात
छुटे कारी ये ओ
मोर पछीना ए न
तोला का तो दुःख जोड़ परे ओ
मोला बता दे ओ, भाई ये दे जी

जऊने समय कर बेरा मा
मोर मिरगा ये ओ
देथे मिरगिन के जवाब ला
सुनिले मिरगिन बात
काल मिरगा ये राम, मोला आये हे ओ
एक जोगी ये न
ओ कुदावत ओ
मोर चोला ल लेबे बचाय ओ,
ये बचाये ओ, भाई ये दे जी।

जब बोलय मोर मिरगिन ह
सुनिले जोगी बात
कहना वचन ल ओ मान जाबे
छै आगर छै कोरी मिरगिन
माल छटवां निमार
मोर काला मिरगा मत मारव ओ
जोगी मारव ओ, भाई ये दे जी।

कहना वचन जोगी नई मानय
सुनिले भगवान
देख तो बेटा भरथरी ये
गऊ मारे मा ओ
हैता लगथे न
तिरिया मोर राम
पाप परथे ओ
छतरी के पिला, रनबर रेगे राम
मय हर छतरी जोनी ये दे धरेंव ओ
भाई धरेंव ओ, रानी ये दे जी।

काला मिरगा ला मारिहँव
तिरिया मारँव ओ
भारी पाप मोला पिरथे
भरथरी ये न
एके गांछ गिंया मोर मारत हे ओ
दसरैया ए राम। मोर तीने गांछ मा
मोर छाती ओ। मोर बन ओ।
ओदरत हे ओ, ओदरत हे ओ, भाई ये दे जी।

राम अऊ राम ल कहिके
मोर मिरगा ये ओ
देखतो जमीन मा गिरिगे
सुनिले भगवान
मोर रानी ये ओ
छै आगर छै कोरी
मोर गरु-गोहारे ल पारँय ओ
चल रोवय ओ, चल रोवय ओ, भाई ये दे जी।

जऊने समय कर बेरा मा
सुनिले भगवान
गाजे के बैरी पराई ये
जोड़ी छुटय ओ
रानी कलपत हे न
मोर भरथरी ओ
मोर घोड़ा मा राम
काला मिरगा ल न, चल लादत हे राम
मोर घरे के रद्दा पकड़य ओ, ये पकड़य ओ, भाई ये दे जी।

एक कोस रेंगय दुसर कोस
तीसर कोस ओ
गोरखपुर के गुरु का आवे
गोरखपुर के गुरु
चले आवत हे राम
भरथरी ये न
जेला देखय दीदी
मोर घोड़ ले ये दे उतरय ओ
ये उतरय ओ, भाई ये दे जी

चरन छुए के आस ये
सुनिले गुरु मोर बात
कहना वचन मोर मान जाबे
गुरु बोलत हे न
गोरखनाथ ये ओ
गोरखपुर के गुरु
सुनले भरथरी बात
तोला लगे - सरापे मिरगिन के ओ,
ये मिरगिन के ओ, भाई ये दे जी। मिरगिन के लगे सरापे ह
मोर चरण ल हो
तुमन ये दे झन छुआ

भरथरी ये ओ
जोगी ल भरे जवाब
सुनले गुरू मोर बात
कहना मानो राम
मोरमा दोष नईये
भगवान ये ओ
मोर महिमा बुझे माया मिरगा ओ
ये भेजाये ओ, भेजाये ओ, जोगी ये दे जी।

जऊने समय कर बेरा म
सुनिले गुरु मोर बात
कइसे कटिही मोर पाप
जोगी भरे जवाब
गोरखपुर के न
मोर गुरु ये ओ
सुनले जोगी मोर बात
भरथरी ये न
मन तउरत है राम
धर-धर दीदी, चल रोवत हे ओ
मोर जइसे विधि कर बेरा में, गुरु बोलय ओ, भाई ये दे जी।

साते जोनी सात महिमा ये
सात बुझे ल ओ
तैंहर ये दे बन जाबे
दुनिया मा ये दे एक सत रहिही
मान जाबे जोगी, तैंहर जोगी बन जाबे
जोगी भेखे ल न
धरि लेबे लला
डोंगरी मं गिया। मोर तपसिया
करिबे ओ, जोगी बोलय ओ, भाई ये दे जी।

सिंग दरवाजा म भरथरी
चला आवथे ओ
देख तो दीदी मोरा घोड़ा मा
सिंग दरवाजा मा आइके
भरथरी ये ओ। देखतो दीदी मोर घोड़ा मा
खड़ा होवय अगिंया
फुलवारानी ओ, मोर सोंचत हे न
मोर गौरा बदन काला हो गय ओ
दाई हो गय ओ, भाई ये दे जी।

जग मा अमर राजा भरथरी
बाजे तबला निसान
का विधि के गारी देवत हे
भरथरी ये ओ। मोर घोड़ा ल न
बारामरद के। मोरे अंगना मा राम
खड़ा करिके न
मोर मिरगा ल ए दे उतारे ओ, ए उतारे ओ, भाई ये दे जी।

सुनले दाई मोर बात ल
पइंया ठेंकत हँव ओ
आर्सिवाद मोला दे देबे
कहना नई मानेंव राम
गलती करेंव दाई
क्षमा कर देबे ओ
मैंहर जोगी के रूप ल धरॅव ओ, बाई ये दे जी।

दुनिया मा एक नारी हे
मोर माता ए ओ
बाल ब्रह्मचारी ओ मय रहिहंव
भरथरी ये न। मोर भरे जवाब
फुलवारानी ओ। समझावत हे न
सुनले बेटा मोर बात
मोर एक बेटा। मोर कइसे असुभ दियना
बारे ओ, बाई ये दे जी।
जऊने समय कर बेरा म
सुनिले भगवान
का दुःख ला गोठियावॅव मय
भरथरी ये ओ
बीच अंगना म राम
चल बइठे हे न
फुलवारानी ओ। सुनिले बेटा मोर बात
मोर कइसे के होय गुस्सा ओ, चल बोल ओ, भाई ये दे जी।

काला मिरगा ल लाये हस
सुनिले बेटा बात
का मिरगिन दिये सरापे न
हाल दिये बताय
मिरगिन न दाई
मोला गारी ये ओ
मोला दे हे सराप भर-भर ये न
दुःख ल बतावॅत ओ, बतावॅत ओ
भाई ये दे जी।

जबधन बोलत हे भरथरी
सुनिले दाई बात
का दुःख ला गोठियावव ओ
गऊ मारे मा ओ
हैता लगथे दाई
तिरिया के मय। जोड़ी छोड़ा पारेंव न