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भरथरी लोक-गाथा - भाग 3 / छत्तीसगढ़ी

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

चल मिरगा ल राम
मय जियावॅव दाई
मोर अमरित पानी ल लावॅव ओ
जोगी लार्वव ओ, भाई ये दे जी।

घोड़ा मा मिरगा ल लादिके
भरथरी ये ओ
देखतो दीदी चले जावत हे
गोरखपुर म न
चले जावय गिंया
गोरखनाथ गुरु
धुनि रमे हे न
जेकर तीर म जाय भरथरी ओ
भरथरी ओ, भाई ये दे जी।

लगे हे धुनिबाबा के
गोरखनाथ के ओ
घोड़ा म मिरगा ल लादे हे
चले आवय गिंया
भरथरी ये न। मोहिनी ये दीदी
मोर मोहिनी बरोबर दिखय ओ, भरथरी ओ भाई ये दे जी।

गोरखनाथ के चेला ये
मोर चेलिन ओ
भरथरी ल कइसे देखत हे
मोहिनी ये गिंया। ये मोहावत हे ना
चेलिन बोलत हे ना
कहसन सुघ्घर हे ना
मोर कहां के लिखे भगवान ये ओ
जेहर भेजे ओ, बाई ये दे जी।

मोहिनी बरोबर मोहत हे
भरथरी ये राम
गोरखनाथ गुर के चरण मा
चले जावत हे न
सुनिले गुरु बात
मिरगा ल कहय, तय जिया देबे न
तोर पईया लागव बारंबार गा, बारंबार गा, भाई ये दे जी।

तब तो बोलय गुरू गोरखनाथ
सुनिले राजा मोर बात
मिरगिन के लागे सरापे न
चरण छुए नई दॅव। सराप ये गा
पाप धो लेबे न
जेकर पाछू चरण छूबे गा, ये दे छूबे जी, भाई ये दे जी।

तब तो बोलय भरथरी
सुन गुरु मोर बात
मिरगा जिया देना कहत हॅव
मिरगा ल गुरु। तय जिया दे गा
मोर मिरगिन सराप, मोला लगे हे न
ये ला मिटा देते न
मोर अइसे बोलय भरथरी ओ, भरथरी ओ, भाई ये दे जी।
गोरखनाथ गुरु कहत हे
मिरगा देहँव जियाय
तब तो बोलय भरथरी ल

जोग साधे ल रे
तोला परही बेटा
बारा साल मे न। जोग साधबे बेटा
तब जाके तोर पाप ह कटय गा, बैरी कटय गा
भाई ये दे जी।

लगे हे धुनि गुरु के
गोरखनाथ के न
जेमा आवत हे राम
का तो कूदय भरथरी ये
लगे हे धूनि गोरखनाथ के
जेमा जा कूदथे भरथरी ह
जीव ल देवत हे तियाग
सुन राजा मोर बात
गुरु गोरखनाथ जेला
देखत हे न
मय तो कइसे दुख म परेव ओ, ये परेव ओ, भाई ये दे जी।

भरथरी ये दे जीव ल
मोर बचावत हे राम
गुरु गोरखनाथ ये
धुनि मं जावे अमाय
भरथरी ल निकाल
गुरु मोर जावत हे
मोर मिरगा ल देवय जिआय, ये जिआय ओ, भाई ये दे जी।

आगू जनम के ये मिरगा
मोर साधू ये राम
छय आगर छय कोरी चेलिन ये
जेकर काला मिरगा
जनम लेके बेटा
सिंघलदीप म गा
राज करीस
जेला मारे तॅय बान
ये दे लागे सराप
मोर कइसे समझाय भरथरी ल, भरथरी ल ओ, भाई ये दे जी।

तब तो बोलय भरथरी ह
सुन गुरु मोर बात
जोग ल साधव मॅय अभी न
गुरु बोलत हे आज
सुन राजा मोर बात
हावस कच्चा कुंवर
जोग नई साधव रे
चार दिन के सुख ल, भोग ले गा, भोग ले गा, भाई ये दे जी।

जेकर पाछू म भरथरी
चले आबे बेटा
जोग सधा देहॅव तोला मय
पाप काटिहॅव तोर
अइसे बोलत हे न
भरथरी ल बात
भरथरी ये ओ
घर आवत हे न
मोर गुरु गोरखनाथ के चरण छुवय ओ, भाई ये दे जी।

घर मं, रंगमहल मं
मोर आइके ओ
कइसे माता ला बतावत हे
सुन दाई मोर बात
काला मिरगा ये ओ
मय तो दिहेंव जिआय
गोरखनाथ गुरु
जहां धुनि रमाय
मोर काला मिरगा ल जिआये ओ, जिआये ओ, भाई ये दे जी।

आनंद मंगल होवत हे
फुलवारानी ओ, बेटा ल गोदी मँ बैठारत हे
मोर देख गिंया
आनंद मंगल मनाय
अंगना मँ हीरा
मोर राजा के न
ये दे परजा ल ओ
मेवा मिठाई बँटाय
अब जेला देखय फुलवारानी ओ, भरथरी ओ, भाई ये दे जी।

बारा बरस के तोर ऊमर आय
अब आगे बेटा
तोर घर में बसा देवॅव
कय दिन के जिन्दगी, मोर बाचे बेटा
तोर सुख ल राम
देखि लेतेंव बेटा
ये दे जेखर पाछू नैना ग, सुख भोगे गा, भाई ये दे जी।

अइसे फुलवा सोचिके
सुनले महराज
का तो नाऊ ल बलावत हे
कइना खोजे बर न
लिख पाती भेजय
खोज के आवा गिंया
मोर उत्तर दिसा
नई तो पांय कहना
दक्षिण बर जाय
कइना नइ पावय न
मोर आके बात ल बोलय ओ, कइसे बानी ओ, भाई ये दे जी।

खोजत-खोजत कइना ल
पथ बीच मँ ओ
जइसे पावत हे नाऊ ह
रानी ल देवय बताय
जइसे भरथरी आय
तइसे सुन्दर कइना
देखि आयेंव दाई
सुनरानी, मोर बात
समादेई ये ओ, मोर भरथरी के कइसे नारी
बनजाही ओ, भाई ये दे जी।

सुन्दर जांवर जोड़ी ये
दुनिया मां रानी
अइसे बोलत हावय नाऊ ह
जग मँ नाम कमाय
जइसे कइना ये न
तइसे राजा हमार
सादी कर देवा ओ
रानी ल बोलत हे ओ
जेकर बानी ल सुनत हे रानी ओ
भाई रानी ओ, भाई ये दे जी।

लिख के पतरिका भेजत हे
नेवता ल भेजय
सुनले कहत हावॅव बात ल
परतापी राजा, जेकर बेटा ये न
भरथरी ह ओ
मोर आनी बानी के राजे ल नेवता जावय ओ, भाई ये दे जी।

शादी के करे तियारी
ये दे रचे बिहाव
देख तो रानी सामदेई के
घर मा लानत हे न
गवना ल कराय
मोर रंगमहल मँ गिया
हीरा साहीं दीदी
दूनों दिखत हें न
मोर फुलवा बरोबर चमके ओ, रंगमहल ओ, भाई ये दे जी।

गवना कराके भरथरी
चल लानत हे राम
रंगमहल ल सजाये हे
फौज-फटाका ओ
ये दे फोरत हे राम
संगी सहेली न
मंगल गीत सुनाय
मोर आनंद बधाई मनाय ओ, मनाय ओ, भाई ये दे जी।

एक दिन बइरी गुजरत हे
दूसर दिन ओ
तीन दिन के छइंहा मा
घर सौंपत हे न
भरथरी ल ओ
रानी सामदेई न
मोर राजा बनाय भरथरी ल, भरथरी ल ओ, भाई ये दे जी।

का तो गाजे के पराई ये
समय बीतत हे राम
जोगी के जोग बैरी दिन ये
चले आवय गिंया
मंगनी के बेटा
बारा बच्छर बर
आय रहिस दीदी
फुलवारानी ये ओ
जेला गय हे भुलाय
मोर तो सुरता लगे हे विचार ओ,
ए विचार ओ, भाई ये दे जी।

रंगमहल म जावत हे
भरथरी ये ओ
सामदेई जिहां पलंग म बइठे हे
भरथरी ये न
चले जावय दीदी
मोर पलंग के ओ
ये दे तीर म न
कइसे विधि कर हबरय ओ, ये हबरय हो, भाई ये दे जी।

पलंग मं पॉव ल रखत हे
जऊन समय म राम
गाज के देख तो पराई ये
खोन-पलंग ए ओ
टूट जावय दीदी
धरती मं मढ़ाय
जेला देखत हावय भरथरी ओ, भरथरी ओ, भाई ये दे जी।

का तो जोनी मय पायेंव
का तो लागे हे पाप
का तो कारण पलंग मोर टूटगे
रानी देवव बताय
भेद नई जनँव ओ
मोला दे दे बताय
ये दे अइसे विधि भरथरी ओ
दाई पूछय ओ, भाई ये दे जी।