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भरथरी लोक-गाथा - भाग 7 / छत्तीसगढ़ी

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

सुनले भांटो मोर बाते ल
हाल देहॅव बताय
झन तो कहिबे तेंहर बात ल
भेद रखबे लुकाय
तबतो दिहँव बताय
ये दे अइसे बानी रानी बोलय ओ, भाई ये दे जी।

तीन वचन चुकोवत हे
रुपदेई ये ओ
नई तो कहय मानसिंह ल
सुनले महराज
रुपदेई ये ओ
भरथरी ल, कइसे बानी बताय
सुन राजा मोर बात
ओही जनम के
येह का लाग मोर
ये दे अइसे बानी
कहिके पूछय ओ, भाई पूछय ओ, रानी ये दे जी।

राजा मानसिंह ल देखत हे
भरथरी ह ओ
जेकर बेटा ल का देखय
मन मँ करे विचार
सुनले कहना मोर बात
ओही जनम के ओ
तोर बेटा ये बाज
ए ही जनम मँ न
तोर रचे बिहाव
ये दे अइसे बानी
भरथरी ओ हीरा बोलय ओ, भाई ये दे जी।

जइसे आज
होवत हे मोर संग बिहाव
तइसे सुनले राजा तँय
ओही जनम के
सामदेई ये न
तोर दाई ये ओ
सुन भांटो मोर बात
ये ही जनम मँ
तोर संग बिहावे ग
ये दे होगे ग, ये दे होये ग, भाई ये दे जी।

तब तो बोलय भरथरी हर
का करॅव भगवान
विधि के लिखा ह नई कटय
अइसे बानी ये राम
मनमें सोचत हे न
पाती होतिस हीरा
बांची ले ते कइना
का तो करॅव उपाय
नई तो जानेव गिंया
मोर भेदे ल आज बताये ओ
ये बताये ओ, भाई ये दे जी।

सुनले रानी मोर बात ल
पाछू-आगू ओ
भेद ल देते बताय तॅय
सुनले रानी बात
रंगमहल म
लहुटी के सारी
घर नई जावॅव ओ
बाती बोलत हे न
भरथरी ये राम
ये दे कइसे बानी ल बोलय

तोरे ये सातो के हत्या
भारी पाप मोला परे हे
पाप लेहँव मिटाय
जेखर पाछू रानी
लौटी जाहॅव ओ
ये दे अइसे बानी ल बोलय ओ, हीरा बोलय ओ, भाई ये दे जी।

सुन्दर बानी ल बोलत हे
भरथरी ये ओ
रानी ल बोलिके
चले जाय महराज
घोड़ा छोड़त हे नाम
जोग साधे के ना
मन म करे विचार
रंगमहल में राम
चले आवत हे ओ, चले आवय ओ, भाई ये दे जी।

रानी ल बोलत हे
दाई सुन मोर बात
मय तो चलेंव जोग साधे बर
राज पाठ ल ओ
छोड़ देवॅव दाई
नई तो करॅव राज
जो साधिहॅव ओ
रानी कहत हे न
मोर आंख के रे
बेटा तारा ये
मोर एके अकेला जनम बेटा धरे ग, भाई ये दे जी।

बुढ़त काल के लाठी अस
संग छोड़व न आज
कलपी-कलप दाई का रोवय
गाज के पराई ये ओ
बेटा के छुटाई ये न
रंग महल ये
दरबार ये न
मोर रोवय हीरा
भरथरी ल ओ
समझावत हे न
मोर हरके अउ, बरजे ल नई मानय भरथरी, भाई ये दे जी।

घोड़ा ल छोड़त हे रंगमहल
साज-सज्जा उतार
देख तो दीदी चले आवत हे
सामदेई ये ओ
गोड़ तरी गिरय
सुन जोड़ी मोर बात
झन जावा हीरा
नई तो मानत हे न
मोर राजमहल ले
जावय ओ, चले जावय ओ, भाई ये दे जी।

गोरखपुर के रद्दा ल
राजा धरत हे राम
जिहां बइठे गोरखनाथे
भरथरी ये राम
ये के कोस रेंगय
दूसर कोस ओ

तीन कोस ए ना
बारा कोसे के ओ
मोर अल्दा रेंगय
मोर छय महीना छय दिन बितय ओ, बितय ओ, रानी ये दे जी।

छय महीना छय दिन बीतत थे
भरथरी ओ
जाइ हबरगे गोरखपुर म
कइसे बोलत हे राम
गोरखनाथ ल न
गुरु सुन मोर बात
चले आयेंव राजा
जोग साधे ल ओ
गुरु मानी ले बात
मोला जोग के रद्दा बतादे ओ, भाई बता दे ओ, भाई ये दे जी।

गोरखनाथ के चेलिन ये
मोर बइठे हे राम
मोहनी सूरत बनाये हे
भरथरी ह न
कइना जावय मोहाय
बानी का बोलय राम
अइसन हे जोड़ी
मय हर पा जातेव न
जोग काबर साधतेंव
ये दे जोग छोड़ी चल देतेव ओ चल देतेव ओ, भाई ये दे जी।

लाख समझावत हे राजा ल
नई तो मानय दाई
जोग के लागे हे आसे न
सुनले राजा मोर बात
जोग झन साधा हो
आनन्द मंगल ये न
मोर हरके बात मान जाबे जोगी, जाबे भाई, भाई ये दे जी।

बारा बछर के ऊपर हे
सुनिले लाला बात
झन करबे जोग के साध न
गोरखपुर के दीदी
गोरखनाथ गुरु ओ
समझावत हे न
भरथरीये राम
नई तो मानय गिंया
मोर कइसे विधि जिद्दी करय ओ, भाई करय ओ, रानी ये दे जी।

माता पिता जनम दिये
गुरु दिये गियान
सुन ले बेटा मोर बाते ल
तोला गियान न
मॅयहर देथॅव तोला लाला
तॅयहर जोग के साथ झन करव ओ, झनी करव ओ, भाई ये दे जी।

कहना वचन जोगी नई मानय
भरथरी ये ओ
देख तो दीदी हरके नई मानय
बरजे ल गिंया
नई तो मानत हे ओ
भोर धुनि ये ओ
चल जलथे न
मोर कइसे विधि जोगी कूदे ओ, भाई कूदे ओ, भाई ये दे जी।

गोरखपुर के मोर गुरु ये
जल बइठे हे ओ
मॅयहर का करॅव राम
ये ह कूदिगे दाई
हरके ल गिंया नइ तो मानिचे न
मोल बालक रूपी जनम ओ, येहर धरे ओ, भाई ये दे जी।

कोठी में आगी समाइगे
बन आग लगाय
जबधन कइसे मय करॅव न
कोठी में आगी लगाय गय
बदन गय कुम्हलाय
जबधन राजा मॅय बोलव न
अमृत पानी ल ओ
गोरखनाथ ये
गुरु चल सींचत हे न
अग्नि हर गिंया
मोर सांति ये ओ
चल होगे दीदी
मोर भभूत ये दे निकाले ओ, ये निकाले ओ, भाई ये दे जी।

कइसे बइरी मय तो घर जाहॅव
कइसे रहिहॅव गुरु
जेकर भेद बता दे न
नई तो जावॅव गुरु
जोग साधिहँव न
रंग महल मँ नई तो रहॅव गुरू
मोर अइसे बानी ल बोलय गा, राजा बोलय ग, भाई ये दे जी।

ओतका बानी ल सुन के
गोरखनाथ ह ओ
देख तो दीदी भरथरी ल
मुंह खोली के राम
तीनों लोक के ओ
दरस ल देखाय
बानी बोलत हे राम
भुला जाथे बेटा
कोन-कोन जनम कोन का अवतार
न लेथे लाला
ये दे तीनो लोक के दरस ए करावय ओ, भाई ये दे जी।

तीनो लोक ल देखके
भरथरी ये ओ
गुरु गोरखनाथ के
ये दे मुंह म न
तीनों लोक ल देखय
नई तो समझय राजा
जोग नई छोंड़व न
मोर मिरगिन के
लागे सरापे ग, ये सरापे ग, भाई ये दे जी।

हरके अऊ बरजे ल नइ मानय
तब बोलय गुरु गोरखनाथ
सुनले राजा मोर बात
भरथरी ये गा
जोग साधे बेटा
कहना मानव न
मोह भया लाला
छोड़ी देबे बेटा
ये दे जकर पाछू जोगे ग, तय साधबे ग, भाई ये दे जी।