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भरथरी लोक-गाथा - भाग 9 / छत्तीसगढ़ी

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

धरय चिमटा भरथरी
पांच पिताम्बर ओ
का तो गोदरी ल ओढ़त हे
टोपी रतन जटाय
देखतो पहिरत हे
भरथरी रेंगना रेंगय राम
कोसे-कोसे के तो रंेगना ये
एक कोस रेंगय
दूसर कोस, दसे कोस बइरी का रेंगय
बीस कोसे ये ओ
तीस कोसे के अल्दा म
गढ़ उज्जैन राम
जिहां हबरत हे भरथरी
धुनि लेवय जमाय
का तो बइठत हे धुनि मँ
डंका देवय पिठाय
सुन लेवा रानी
गढ़ उज्जैन के ओ, सुनले रानी भीख ले आवा ओ, भाई ये दे जी।

अतका बानी न रानी सुनत हे
रंगमहल मँ राम
साते बइरी सतखंडा ये
सोला खण्ड में ओगरी
बत्तीस खंड अधियारे न
साये गुजर म ओ
जाई बइठे सामदेई
नैना देखय निकाल
का तो झरोखा ले झाँकय
धुनि लेहे रमाय
भरथरी राजा ह बइठे हे
जोगी के धरे भेख
तऊने ले देखत हे सामदेई, राजा ये दे जी।

रंगमहल ले आवत हे
थारी मोहर ये ओ
धरे हावय रानी सामदेई
आंगन म हीरा
बारापाली के साये गुजर ले ओ
नहकत चले आवय सामदेई
भरथरी मेर आय
जऊने मेर धुनि रमाय हे
बानी बोलत हे राम
सुनले राजा मोर बात ल
जोग साधे ह हो
जोग ल बइरी तु छोड़ देवा
कऊने कारण राजा पर के नारी मोर बिहाव करेव
रंग महल म ओ
काबर लाये हव तुँ राजा, भाई ये दे जी।

अतका बात ल सुनके
भरथरी ये राम
का तो बोलत हावय बाते ल
सुनले रानी मोर बाते ल
का गत होतिस बाचतेंव
करम बाँचे नई जाय
मोर करम जोगी लिखे हे
सुनले कइना मोर बात
जोग साघ लिहेंव कहत हॅव
बानी बोलत हे राम
नई तो मानत हावय रानी ये
सुन राजा मोर बात
राज-पाट ये दे तोला न
दस लाख ये ओ
हाथी ल तोला मय का देवॅव
बीस लाखे बइरी सेना
सुबह मंगा देहव ये दे अंगना म
कथरी देहव सिलाय
टोपी म रतन जड़ देवॅव
धुनि लेवॅव रमाय अंगना मँ बइठ जावा तुम जोगी, भाई ये दे जी।

झन जावा गोरखपुर म
जोगी झन बना राम
अइसे बोलत हे रानी हर
नई तो मानत हे बात
अब तो बोलय भरथरी हर
सुनले रानीमोर बात
जोगे ल न तो मय छोडॅ़व
भीख दे दे कइना
अइसे बानी ल रानी बोलत हे
सुनले राजा मोर बात
घर के नारी मय तुँहरे अॅव
जोग झन साधा ओ
रंगमहल मँ आनन्द करॅव
राज पाट तुँहार
धन दौलत के हे का कमी
हीरा मोती जवरात
छय आगर छरू कोरी सइना हे
रंगमहल मँ आज
कतका सजाये हे रंगमहल
बानी बोलत हे राम, नई तो मानय भरथरी ह, भाई ये दे जी।

का तो भरथरी समझावत हे
जोगी रुपे ल वो
आज तो कइना मँय धरेंव
राज छोड़ देहॅव ओ
ना तो चाही मोला धन-दौलत
ना तो लतका सजाव
ना तो हाथी-घोड़ा चाही वो
ना तो चाही नारी
ना तो मोला घर के तिरिया
मोला जोग चाही
अइसे बानी ल रानी ल बोलत हे
गुरु गोले हे ओ
भीख माँगे तोर अंगना म आयेंव
भीख दे दे कइना
अइसे बानी ल रानी ल का बोलय, भाई ये दे जी।

दे देबे दाई भीख ल
मुख से निकला हे राम
जेला सुनय सामदेई हर
मुर्च्छा खावत हे राम
का तो भुईयाँ मं गिरय
घर के जोड़ी ह राम
का तो भुईयाँ म बइरी गिरत हे
घर के जोड़ी ये ओ
कइसे दाई कहिसे
भेदे जानिस हे का
अइसे गुनत हावय सामदेई
भिक्षा दे दे कइना
बेटा कहिके थारी ल
झोला भंडार दे हमार
अइसे बानी ल राजा बोलत हे, रामा ये दे जी।

का तो रानी बानी बोलत हे
सुन चम्पा मोर बात
घर के राजा ल समझावव ओ
बात नई सुनत न
अइसे बानी ल कइसे कहॅव मॅय
चम्पा बोलत हे राम
सुनले रानी मोर बाते ल
भरथरी के ओ
बहिनी हावय कहिके बोलत हे
गढ़नराकुल म
आज जेला बला लेवा रानी ओ, भाई ये दे जी।

लेके जावत हे राम
का तो धवनिया ह दौड़त हे
एक कोसे रेंगय
दुई कोस बइरी
तीन कोस, दस बीसे ओ
तीस कोस के ओ अल्दा म
नराकुल सहर म ओ, जाई हबरत हे
देख तो ओ
ए धवनिया ये राम
लिखे पाती ल बाँचत हे
पहली पाती ल
बइरी का बाँचय
जेमा लिखे जोहार
तेकर पाछू लिखत हे
भइया तुँहरे ओ
मिरगिन बइरी, मिरगा मारे
मिरगिन के लागे सराप
जोग साधे हवय भरथरी
पाती बाचत हे राम
कलपी-कलप रानी
मैना ये
बइरी रोवत हे राम
काय धन करॅव उपाय ल
आज तीज तिहार
जब तो भइया लेनहार ये
नई तो आये दीदी, मिरगा के लागे सराप ये, रामा ये दे जी।

सुनले बेटा गोपीचंद रे आज
ममा तुहार
मिरगा सराप में का लगे
धुनि देहे रमाय
जोग ल साधे बइठे हे
घर के अँगना हमार
चल ना बेटा समझाये ल
भरथरी के ओ
भांचा आवय गोपीचंद
संग मा मैना ये राम
देख तो दीदी कइसे आवत हे
गढ़ उज्जैन म आज का बाधी चल रेंगत हे, राम ये दे जी।

घोड़ा ल साजत हे
गोपीचंद ये राम
बारा मरद के साज ल कसय
रेंगना रेंगत हे राम
मंजिल-मंजिल के तो रंगना
मंजिल नहकत हे चार
का तो हटरी बजारे ल
बइरी नहकत हे ओ
कदली के बइरी कछारे ल
कइसे नहकत हे राम
देखतो दीदी रथ भागत हे
लस्कर साजे हे राम
जावत हे रानी का गुनय
मैना ये दीदी
गोपीचंद जेकर संग म
चले आवत हे राम
गढ़ उज्जैन मँ आई के, रामा ये दे जी।

का तो पड़ाव ल डालत हे
गांव के मेंढ़ में ओ
कइसे विधि गोपीचंद ये
का तो पड़ावे ल डालत हे
गोपीचंद ये ओ
जेकर माता-मैना रानी ये
चले आवय दीदी
घर म पहुँचे हे के
कहय सामदेई
सुनले मोर बाते ल
भइया तुॅहार जोग साधे
समझा दे न ओ, घर के तिरिया रानी बोलत हे, रानी ये दे जी।

अतका बानी ल सुनत हे
मैना रानी ये ओ
भइया के तीरे म जावत हे
भइया सुनले न बात
काबर भइया तॅय जोगी बने
मिरगा लगे सराप
सुनले न बहिनी मैना ओ
एक बहिनी अस ओ
एक आंखी के तारा अस
सुन मोर बात
कइसे बानी तोला का कहॅव
गुरु गोरखनाथ के बात मोला लागे हे
भीख माँगे ल ओ
घर म आयेंव हॅव
भीख नई देवय ओ
तॅय तो समझा दे सामदेई ल
बेटा कहिके भीख दे देतीस बहिनी ओ, भाई दे दी जी।

अतका बानी ल सुनत हे
मैना ये राम
का तो धरती बइरी फाट जातिस
नारी न ल माता कहत हे
मोर भइया ये ओ
मिरगा के लागे सरापे ह
देख तो साधत हे जोग
घर के बात ल मोर नई मानय
गोपीचंद ल ओ
मैना रानी का बोलय
सुन बेटा मोर बात ला
जावा समझाव ग ममा ल
ये दे आज गा तुँहार
अइसे बानी ल बोलत हे
गोपीचंद ह ओ
ममा ल देय समझाये ना
सुनले ममा मोर बात
जोग ल तुम ममा छोड़ देवो
जोग साधे के हो
आज तुँहार दिन नइ तो हे
अइसे बोलत हे राम
जेला सुनत हवय भरथरी
सुनले भांचा हमार
पईयां लागव बारम्बार ग
जोग नई छोड़ॅव ना
अइसे बानी ल भरथरी ह बोलत हे राम, रामा ये दे जी।

न तो हरके ल मानत हे
न तो बरजे ल राम
न तो मॉनय भरथरी ये
गोपीचंद ये ओ
जेकर माता मैना रानी
सामदेई ल ओ
जाके दीदी समझावत हे
सुनले रानी मोर बात
भइया ल दे देवा भीखे न
छतरी के जनम नई तो छेड़ॅय बइरी जोग ल
कइसे देवत हे ओ
थारी म मोहर धरत हे
कथरी ल हीरा
पांच पिताम्बर के लावत हे
टोपी रतन जटाय
देख तो दीदी हाथी लावत हे
ये दे हाथी म ओ
हीरा मोती ल बइरी लादत हे
लस्कर ल सजाय
देख तो दीदी बइरी मोर सइना ये
कइसे साजि के ओ
कइसे दीदी चलि आवत हे ओ
भिक्षा ले लव राजा अइसे बानी ल हीरा का बोलेय, रानी ये दे जी।

भीख ल द्यरे भरथरी
रेंगना रेंगय राम
तेकर पाछू सामदेई
चले जावय दीदी
सगे म जेकर रेंगत हे
रेंगना रेगय ओ
लस्कर सजाय हावय रानी
जेकर पाछू म
चले जावत हे गढ़ उज्जैन के ओ
छय लाख छय कोरी सेना ये
चले जावत हे संग
गोरखपुर के डहर
का तो पानी ल बइरी पियत हे
पाछू के सैना ये ओ
चिखला चाटंत बइरी जावत हे
गोरखपुर मँ राम
जाके डेरा ल बइरी डारय ओ, रामा ये दे जी।