भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

भवसागर पार हुआ / विजय कुमार विद्रोही

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

आदि गुरु जो संस्कृति दाता,वंदन ऐसी थाती का ।
साँच सनातन धर करता हूँ ,वर्णन भारत माटी का।
उदधिराज पगवंदन करता,और हिमाला मुकुट हुआ ।
पार हुआ आधा भवसागर,जब इस तन ने इसे छुआ ।

गंगा,कोशी,चम्बल,यमुना,क्षिप्रा,झेलम,महानदी ।
कलकल अमृतधार बहाती,पावन कर दीं कई सदी ।
कंचनजंघा,विंध्याचल से ,पर्वत गर्वित करते हैं ।
मेघों से अठखेली करते ,जन में जीवन भरते हैं ।
यही धरा है पोषण करती,कोई भाषा बोली हो ।
भेदभाव कण भर न दिखता,ईद मने या होली हो ।
इसी धरा ने जन्म दिया था,अवधपुरी के त्राता को ।
पुण्यभूमि की रज को छूने,आना पड़ा विधाता को ।
कण-कण, तृण-तृण ज्ञान भरा है,इसकी सभी विमाओं में ।
मंत्रों के स्वर भ्रमण कर रहे,भुवनों और दिशाओं में ।
नमन तुझे हे भगवन! मेरा , इस धरती पर जनम हुआ ।
पार हुआ आधा भवसागर ,जब इस तन ने इसे छुआ ।

सन सन करती पुरवैया में ,लहराती कंचन फसलें ।
रिमझिम रिमझिम बरखा कहती ,आओ थोड़ा सा हँस लें ।
सोंधी सोंधी मिट्टी बोले , मैं भारत का दर्पण हूँ ।
शौर्य वीरता बलिदानों का , देवालय सा तर्पण हूँ ।
मेरी खुशबू जो तेरे मन , प्राणों को छू जाती है।
रक्त घुला है जिन वीरों का ,उनकी याद दिलाती है ।
ये भारत है रिपुदल थरथर ,काँप काँप रह जाते है ।
नर्तन जब काली करती है ,जय भारत कह जाते हैं।
पाँच नदी की पावन धरती ,वीरगर्भिणी मानो तुम ।
अरिदल से संग्राम समय की , अति बलिदानी जानो तुम ।
राजस्थानी धरा जहाँ कण,तृण में शौर्य समाया है।
समरकाल हल्दीघाटी का ,सुन पौरुष हर्षाया है ।
यह भारत है जिसका वंदन,स्वयं दिवाकर करता है ।
प्रथम रश्मि कोणार्क द्वार पर,अर्पित करने धरता है ।
कालवलय पर भारत मेरा , दिनकर का स्वीकार हुआ ।
पार हुआ आधा भव सागर ,जब इस तन ने इसे छुआ ।

यहाँ क्रांति की दीपशिखा,क्षण दावानल होती है ।
भरत सरीखे बालक के पग ,स्वयं वीरता धोती है ।
एक मात्र भूखंड विश्व का ,जिसको माता मान मिला ।
ज्ञानकिरण जब हमने सौंपी ,तब दुनिया को ज्ञान मिला ।
शून्य न देता अगर भारत ,यह जग शून्य पड़ा होता ।
किसी पश्चिमी घाटी के वह ,भूतल मध्य गड़ा होता ।
वीरप्रसूता भूमि यही है ,जिसको जग करता वंदन।
और दिवाकरतुल्य देश का ,कण कण करता अभिनंदन ।
भानुरूप यह चंद्रकला यह ,व्योमपटल पर दिव्यलेख ।
भगवन इसकी थाती को फिर ,वसुंधरा पर आज देख ।
हमने सींचा है लोहू से ,पिघला है तब पाषाण यहाँ ।
मर्यादा ,मान ,प्रतिष्ठा हित ,खग करते बलिदान यहाँ ।
भारत की पढ़ गौरवगाथा ,मेरा जीवन साकार हुआ ।
पार हुआ आधा भवसागर, जब इस तन ने इसे छुआ।