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भादो रैन भयामन दिसि घन घेरे हे / मगही

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मगही लोकगीत   ♦   रचनाकार: अज्ञात

भादो रैन भयामन दिसि घन घेरे हे।
रोहिनी नछतर[1] तिथि अठमी, लाल गोपाल भेले हे॥1॥
किरीट मुकुट घनस्याम से कुंडल कान सोभे हे।
ललना, संख चकर[2] गदा पदुम चतुर भुज रूप किए हे॥2॥
उर वैजयन्ती के माल से देखि रूप मन मोहे हे।
ललना, बिहसि के बोले भगमान, तोहर हम पुतर हे॥3॥
पूरुब जलम बरदान तेही से तोर कोख अयली हे।
ललना, जनि तुहि अरपहुँ डरपहुँ[3] जसोदा घर धरि आहू हे॥4॥
छूटि गेले बंधन जंजीर तो खुलि गेलइ फाटक हे।
ललना, वसुदेव लेलन हरि के गोद पहरु सब सूतल हे॥5॥
बिहसि बोलल महराज, देव जनि डरपहु हे।
ललना लेई चलु जमुना के पार, कमर नहीं भींजत हे॥6॥
यह सुनि के वसुदेव जी जमुना के पार भेलन हे।
ललना, जसोदा घर बाजत बधाई, महल उठल सोहर हे॥7॥

शब्दार्थ
  1. नक्षत्र
  2. शंख-चक्र
  3. न कहीं फेंको या न डरो