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भैया सो जा बारे बीर (लोरी) / बुन्देली

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

भैया सो जा बारे बीर
बीर की निंदिया लागी, जमनाजी के तीर ।।टेक।।

आम से बांदो पालनों, पीपर से बांदी डोर।
जों लो भैया सोवन न पाए, टूट गई लमडोर।।

अब नें रोओ मोरे बारे बीरन
नैनन बह गए नीर।।

धीरें-धीरें आँख मूंद ले
अब आ जैहे नींद।

जब तक मोरो भैया सोहे
झपट बनेंहो खीर।।

ताती-ताती खीर बनैहें
ओई में डारहैं घी।

बाई खीर जब भैया खैहें
ठंडो परहै जी।।