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मक्खी की निगाह / श्रीनाथ सिंह

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कितनी बड़ी दीखती होंगी मक्खी को चीजें छोटी,
सागर-सा प्याला भर जल, पर्वत-सी एक कौर रोटी।

खिला फूल गुलदस्ते जैसा, काँटा भारी भाला-सा,
तालों का सूराख उसे होगा बैरंगिया नाला-सा।

हरे-भरे मैदान की तरह होगा एक पीपल का पात,
पेड़ों के समूह-सा होगा बचा-खुचा थाली का भात।

ओस बूँद दर्पण-सी होगी, सरसों होगी बैल समान,
साँस मनुज की आँधी-सी करती होगी उसको हैरान!