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मगरूर ये चराग दीवाने हुए हैं सब / प्रेमचंद सहजवाला

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मगरूर ये चराग दीवाने हुए हैं सब
गरचे ये आँधियों के निशाने हुए हैं सब

इक कारवां है बच्चों का पीछे पतंग के
उड़ती हुई खुशी के दीवाने हुए हैं सब

पंछी घरों की सिम्त[1] उड़े जा रहे हैं देख
कल फिर उड़ान भरने की ठाने हुए हैं सब

फुटपाथ हों या बाग-बगीचे हों शहृ के
लावारिसों के आज ठिकाने हुए हैं सब

मत कर हिरासाँ[2] कश्मकश-ए-इश्क यूं मुझे
मुश्किल किताबों के वो फ़साने हुए हैं सब

लुक छुप सी छत पे कर रहा है चाँद बार बार
बादल भी ढीठ कितने न जाने हुए हैं सब

  1. तरफ
  2. भयभीत