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मछली की आंख / संतोष श्रीवास्तव
Kavita Kosh से
अर्जुन देख रहा था
केवल मछली की आँख
जिसे बेधना था उसका लक्ष्य
नहीं थी मन में आकांक्षा
द्रौपदी को पाने की
नहीं उदित हुआ था
मन में प्रेम
स्वयंवर भी लक्ष्य न था
केवल मछली की आँख को
बेधना ही महती महत्त्वाकांक्षा थी
शायद इसीलिए बंट गई द्रौपदी
सघन उपादानों में
अर्जुन की तनी हुई महत्त्वाकांक्षा
की प्रत्यंचा ने
बांट दिए कुल के संस्कार
बांट दी नारी की एकनिष्ठता