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मधुश्रवणी गीत-1 / शशिधर कुमर 'विदेह'

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सखी हे ! चलू मधुबन फूल-पात लोढ़य लए ।
आयल मधुश्रावणी, अहिबात पूजय लए ।।

बितल आषाढ़, आयल अछि साओन ।
ऋतु बरसातक परम सोहाओन ।
लागय वसुधा सुन्नर अनुपम ।
चहु दिशि बाट करैत’छि गमगम ।
सखी हे ! प्रकृतिक मनभाओन शिंगार देखय लए ।
आयल मधुश्रावणी, अहिबात पूजय लए ।।

कारी घटा देखि नाचय मयूर ।
शोभित जहँ-तहँ बहु-विधि फूल ।
हरियर घास लसित भेल विपुला ।
उमड़ल जल सञो पोखरि-सरिता ।
सखी हे ! मह-मह शीतल बसात बहइए ।
आयल मधुश्रावणी, अहिबात पूजय लए ।।

फूल फुलायल भरि–भरि डारि ।
चम्पा–चमेली आ नेवारि ।
देखितहि बनय कनैलक कुञ्ज ।
लुबुधल जाहि पर मधुपक पुञ्ज ।
सखी हे ! कामिनी-कञ्चन–कनैल लोढ़य लए ।
आयल मधुश्रावणी, अहिबात पूजय लए ।।

बैसलि डारि करैछ खग कलरव ।
गूँजय बेकल पपीहाक मधु–स्वर ।
सखी हे ! कोइलियो प्रेमक गीत गाबैए ।
आयल मधुश्रावणी, अहिबात पूजय लए ।।