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मधुश्रवणी गीत-2 / शशिधर कुमर 'विदेह'

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चलै गे बहिना ! फुलडाली लय फूल तोड़य लए ।
अड़हूल तोड़य लए ।
सखी ! अड़हूल तोड़य लए ।।

भाँति–भाँति केर फूल फुलायल,
लुबुधल भरि-भरि डारि ।
बेला–बेली, जाही–जूही,
गेना-गुलाब-नेवारि ।
चलै गे बहिना ! फुलडाली लय फूल तोड़य लए ।
अड़हूल तोड़य लए ।
सखी ! अड़हूल तोड़य लए ।।

बेलपात आ फूल सखी हे,
तोड़ब भरि–भरि डाली[1]
बिसहरि-गौड़-महादेव पूजब,
माँगब सिनुरक लाली ।
चलै गे बहिना ! फुलडाली लय फूल तोड़य लए ।
अड़हूल तोड़य लए ।
सखी ! अड़हूल तोड़य लए ।।

आदिकाल सञो यज्ञभूमि,
मिथिला केर अछि ई तिहार ।
छी मिथिला केर बेटी, तेँ ई
जन्मसिद्ध अधिकार ।
चलै गे बहिना ! फुलडाली लय फूल तोड़य लए ।
अड़हूल तोड़य लए ।
सखी ! अड़हूल तोड़य लए ।।

शब्दार्थ
  1. मैथिलीक 'बाँसक कमचीक बनल वस्तुविशेष', नञि कि हिन्दीक 'गाछक शाखा'