भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

मनस्थिति-2 / लोग ही चुनेंगे रंग

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


कोई देखे तो हँसेगा
जैसे शून्य की कहानी
सुन मैं हँसा

बाहर घसियारों की मशीनें
चुनाव का शोर
मैदान में खेल
शोर आता दिमागी नसें कुतरता हुआ भीतर
शून्य की तकलीफ अपने वजूद पर खतरे की
मुझे सुनाई जैसे सुनाई खुद से हो

जाने कौन हँसा
मैं या शून्य.