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मन, कछु वा दिन की सुधि राख / हनुमानप्रसाद पोद्दार

 (राग केदार-ताल तीन ताल)

 मन, कछु वा दिनकी सुधि राख।
 जा दिन तेरे तनु-दुकानकी उठि जैहें सब साख॥
 इंद्रिय सकल न मानहिं अनुमति छोड़ चलैं सब साथ।
 सुत, परिवार, नारि नहिं को‌ऊ पूछैं दुख की गाथ॥
 वारँट लै जम-दूत आ‌इ तोहि पकरि बाँधि लै जाय।
 को‌उ न बनै सहाय काल तिहि देखत ही रहि जाय॥
 जम के कारागार नरक महँ अतिसय संकट पाय।
 बार-बार करनी सुमिरन करि सिर धुनि-धुनि पछिताय॥
 जो यहि दुख तें उबरो चाहै तो हरि-नाम पुकार।
 राम-नाम ते मिटै सकल दुख, मिलै परम सुख-सार॥