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मन एवं मनुष्याणां / प्रसन्न कुमार चौधरी

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1.
जन्मने की अनगिनत कहानियाँ हैं
इनमे सागर हैं, सीपियाँ हैं
धरा है, घट-पनघट है, नदियाँ हैं
कायिक अंग हैं, वाचिक मंत्र हैं, कर्म हैं
अम्बर है, अग्नि है, अनिल और दिशाएं हैं..............
जन्मने की अनगिनत कहानियाँ हैंं
और इन सबमें मै हूँ -
सागर और सीपीओं में, नदी धरा-घट-पनघट में अंग मंत्र कर्म में
अम्बर में अग्नि मे स्फुर और दिशाओं में ...................
जन्मने की अनगिनत कहानियाँ हैं
इसलिए जन्म नहीं है
जन्मने की क्रिया अजन्मे के सर्वनाम से ही अर्थ पाती है
जब वह छोड़ देती है सर्वनाम का साथ
तब
क्षणभर रमण करती है स्फुलिंग की तरह
अर्थ से घबड़ाकर
व्यर्थ बन जाती है
तौलती है तुलती है
बिकती है बेचती है
राजमार्ग के किनारे
लैंप-पोस्ट के सहारे
निर्वसन खड़ी हो जाती है
व्यर्थ क्रियाओं के कोलाहल से भरी दुनिया जन्मने का अर्थ मांगती है
फिर जन्मने की अनगिनत कहानियों में डूब जाती है
व्यर्थ की सŸाा और अर्थ के सत्य की दुविधा में खो जाती है
जन्मने की अनगिनत संभावनाएं हंै
और उनका निषेध भी
संभावनाओं के अर्थ नहीं होते
लेकिन जन्मने की हर कहानी अर्थवान होती है
जन्मने का अर्थ अनगिनत व्यर्थ संभावनाओं में हर क्षण हर पल घुलता रहता है
जन्मने की अनगिनत संभावनाएं हैं
और इनमें एक मैं हूँ
यदि मैं न भी होता तो क्या होता ?
सबद ऩुस्तिकारू5 प्रसन् न कुमार चौधरी की लम् ब कवििा 12
अनगिनत संभावनाओं के बीच
जन्मना एक संयोग है
यही संयोग फिर आवश्यकता और नियति बन जाता है
संयोगों के घात-प्रतिघात से चलती यह दुनिया चाहती है जानना अपनी नियति
फिर खो जाती है नियति की कहानियों में
संयोगों की सŸाा और नियति के सत्य के द्वन्द्व में डूबती-उतराती है
जन्मने की अनेक व्याख्याएं हैं
समुद्र मंथन, शरीर-मंथन, शव-मंथन से टेस्ट-टयूब मंथन तक
जन्मने की ब्रह्माण्डीय परिकल्पना से लेकर एडेनोसिन ट्राइफॉस्फेट तक
हजार सिरोंवाले पुरूष की बलि से डीआॅक्सीराइबो न्यूक्लियक एसिड 2 तक
अपनी प्रतिकृति आप गढ़नेवाले परमाणुओं की अद्भुत कला से चकित दुनिया
भूलती जाती है बलि से जन्मने की कथा
प्रतिकृति गढ़ना बन जाता है सबसे बड़ा आदर्श
हम होना चाहते है वह जो दूसरा है
हम लेना चाहते है वह जो उसके पास है
हम जीना चाहते है वह जो दूसरा जीता है
हम खाना चाहते है वह जो दूसरा खाता है
हम लिखना चाहते हैं वह जो दूसरा लिखता है
हम बोलना चाहते हैं वह जो दूसरा बोलता है
प्रतिकृति -संस्कृति का दिक्-काल हमारी कोशिकाओं के न्यूक्लियोप्रोटीन से
हमारे परीक्षा-भवनों तक
शयन-कक्षों से अबोध शिशुओं की तुतलाहट तक विस्तार पाता है
फिर प्रतिकृतियों के कंक्रीट और मांसल जंगल में
हम ढंूढ़ते है सृष्टि
प्रतिकृतियों की सŸाा और बलि से जन्मने के सत्य का द्वन्द्व हमे कचोटता है, तोड़ता और जोड़ता है
व्यर्थ की सत्ता और अर्थ का सत्य
संयोगों की सत्ता और नियति का सत्य
प्रतिकृतियों की सत्ता और बलि से जन्मने का सत्य
सभ्यता इन्हीं सनातन द्वन्द्वों की महागाथा है
2
एक नदी@ दोनों किनारे कास का जंगल
चांदनी के बिखरे टुकड़ों की तरह जहां-तहां फैली बालुकाराशि
एक नदी परम्परा में रची बसी
फिर भी परम्परा से कभी बंधी नहीं
सबद ऩुस्तिकारू5 प्रसन् न कुमार चौधरी की लम् ब कवििा 13
एक नदी चिरन्तन
युवती सनातन
भला कब तक एक मार्ग की ब्याहता होकर रहती
मार्ग तृप्त हो जाता है@ सूख जाता है
नदी बहती रहती है
कभी जीववत्सा कभी बलान के मार्ग पर
अपनी उर्वरता बिखेरती @एक अल्हड़ ग्रामबाला की तरह प्यार लुटाती
नहीं छिनाल नहीं
महाप्रेयसी महाजननी है मेरी कमला 3
महाप्रेयसी क्षणिक कामसुख देनेवाली पॉपकार्न पे्रयसी नहीं होती
महाप्रेयसी जीवनसुख देनेवाली ब्याहता प्रेयसी नहीं होती
महाप्रेयसी परमसुख देनेवाली अध्यात्म प्रेयसी नहीं होती
प्रेम जो कामसुख
जीवनसुख
परमसुख से भी परे जाता है
एक प्रवाह होता है
महाकाल की तरह
त्रिसुखदायिनी कमला सिर्फ बहती है
कभी कुछ लेती नहीं
कभी क ुछ मांगती नहीं
बस बहती रहती है
आज इस कल उस
मार्ग को तृप्त करती
मार्गाें की समझ से परे प्रवाहिका का भी हृदय होता है
वह भी बिछुड़ने के समय रोती है, कलपती है
पर कौन समझे उसे@कौन मनाये उसे
हाँ मत मनाना मुझे
मैं हृदयहीन@विश्वासघातिनी@मत रोकना इस पापिनी को
न वे स्त्रैणानि सख्यानि सन्ति सालावृकाणां हृदयान्येता 4
कमला महाजननी
चिरन्तन गर्भिणी
अपनी कोख में सहेजकर लाती है देवमाटी
इसी मिट्टी के सीमान्त पर
जब वह चैतन्य हो उठती है
मैं आया - सैलाब के साथ बिना कॉलबेल बजाये
आँखेें मुंदी थी कान खुले थे
मेरे पीछे सामगान था -प्रणेता थे, प्रस्तोता थे, उद्गाता और प्रत्याहारी थे
सुसज्जित कमरा था - सोफे पर वाल्ट डिज्ने का पूरा संसार था
बात करनेवाले कम्प्यूटर थे और पूरी दुनिया एक फ्लॉपी में सिमटी थी
कोने में एक नन्हा सा सेटेलाइट था जो अभी-अभी यूरेनस की परिक्रमा कर लौटा था
सबद ऩुस्तिकारू5 प्रसन् न कुमार चौधरी की लम् ब कवििा 14
मेरा अपना दर्ज हो चुका था
स्क्रीन पर एक मर्लिन मुनरो जैसी लड़की मुझे मेरा नम्बर दे चुकी थी
मेरा रक्त परीक्षण हो चुका था
सब ठीक था लेकिन कुछ था जो इस सातवीं पीढ़ी के कम्प्यूटर की समझ से परे था
मेरा संतति प्रवाह उनके फ्यूचर प्रोजेक्शन से मेल नहीं खाता था
टाइम मशीन से वे मेरे अतीत में गये
मेरे जेनेटिक कोड को डिकोड करने की कोशिश की
लेकिन कुछ हाथ न लगा
कम्प्यूटर की वाइरल टेस्टिंग की गयी वह ठीक था
सैलाब की मिट्टी के साथ आया है
शायद स्वायल टेस्ट से कुछ पता चले
स्क्रीन पर यूरेनस की मिट्टी के चित्र देखते बूढ़े ने कहा था
तब तक प्रणेता आगे आ चुके थे
धीमे से मेरे कान में कहा - तुम स्वर-शिशु हो
सात सुरों की अद्भुत सरंचना - जीवन-राग
मेज पर प्लेब्वॉय का ताजा अंक पटककर
सोफे पर बैठे युवक ने अपना पॉकेट कम्प्यूटर निकाला
स्क्रीन पर कुछ म्युजिकल नोट्स उभरे
वाउ ! इसमें तो ऐसा कोई राग नहीं
हताश होकर लुढ़क गया वह
इस बीच लेजर पिं्रटर से एक कागज निकला
वंशवृक्ष था जिसके अन्तिम खाने में मेरा नाम होना चाहिए था@नहीं था
अधर्म-मिथ्या
दंभ-माया
क्रोध-हिंसा
कलि-दुरूक्ति
मय-मृत्यु
नित्य-यातना 5
इस वंशावली में मेरा नाम नहीं था
दरवाजे पर औरतंे झुण्ड में सोहर गा रही थीं
मेरी अँाखंे खुल गयीं@ वहाँ कुछ नहीं था
ऊपर फूस की छत थी
सामने मिट्टी की दीवार थी
जल था@जल प्रलय था - और सिर्फ मैं था अबोध शिशु
सबद ऩुस्तिकारू5 प्रसन् न कुमार चौधरी की लम् ब कवििा 15
कमला महाविद्या 6
बोली -
प्रवाह बनना मेरे शिशु, प्रवाह
जब मार्ग ही प्रवाह बन जाये तब प्रवाह के खिलाफ प्रवाह बनना
लोग कहेंगे सब चलता है
तुम कहना सब नहीं चल सकता तुम नहीं चलना
लोग कहेंगे इट डजंट मैटर
तुम कहना इट डज मैटर तुम गौर करना
लोग कहेंगे शब्दों के अर्थ में मत उलझो
तुम कहना यह कैसे संभव है तुम अर्थ पर अमल करना
चुपचाप अटल भाव से बहना होगा तुम्हें
उस वंश परंपरा के विरूद्ध जिसमें तुम्हारा नाम नहीं है
अपने पैरों से चलना
अपने हाथों से श्रम करना
अपने मस्तिष्क से सोचना
अपनी आँखों से देखना स्वप्न बुनना
अपने कानों से सुनना संगीत रचना
व्यस्त भीड़ जिसे लोग दुनिया या समाज कहते हैं
तुम्हारी ज्ञानेन्द्रियों-कर्मेन्द्रियों को कुंद करेगी
लेकिन याद रखना
ऊर्जा संरक्षण के इस दौर में भी सबसे जरूरी है
अपनी ज्ञानेन्द्रियों-कर्मेन्द्रियों का संरक्षण-संवद्र्धन
और सबसे बड़ी बर्बादी है
उनका शिथिल पड़ जाना पार्किन्संस डिजीज की तरह
तलाश सकते हो तुम ऊर्जा के विकल्प
लेकिन कोई विकल्प नहीं इन इन्द्रियों का
चुपचाप अटल भाव से ज्ञानरत कर्मरत रहना होगा तुम्हें
उस वंश-परंपरा के विरूद्ध जिसमे तुम्हारा नाम नहीं है
विनायक बनना, मेरे शिशु
विघ्ननाशक विनायक
सुभगः सुन्दरतरो गजवक्त्रः सुरक्तकः।
प्रसन्नवदनश्चातिसुप्रभो ललिताकृतिः।। 7
जब मानवगणों की रचना हुई
तब उनके पास सबकुछ था सिर्फ बुद्धि नहीं थी
उनका मस्तक एक साफ्टवेयर था
वृहस्पति ने जिसकी प्रोगे्रमिंग की थी
उनके अपने डिजिटल कोड्स थे@रिग्रेसन टेबल्स थे
सबद ऩुस्तिकारू5 प्रसन् न कुमार चौधरी की लम् ब कवििा 16
पूरा जीवन एक प्री- रेकॉर्डेड विडियो फिल्म की तरह था
जिसे रिमोट कंट्रोल से आॅन कर दिया गया था
और जब जहाँ जरूरी होता फास्ट फारवार्ड, रिवाइंड या पॉज कर दिया जाता
मस्तिष्क थे जिनमें बाह्य जगत छायाचित्र की भांति अंकित होते
लेकिन सपने नहीं थे, कल्पना का उन्मेष नहीं था
आंखें थी जो स्थिति अनुरूप रेस्पांड करतीं
लेकिन शोख और शरारती नहीं थीं
नयन अनुरंजित नहीं था
प्रीतिस्निग्धैर्जनपदवधूलोचनैः पीयमानः 8 का रस संसार नहीं था
होठ थे जो खुलते और बन्द होते
लेकिन लब नहीं थे
मादक और मधुर उष्मा और खुशबू से सराबोर
जैसे गिरिमल्लिका
पूरा अस्तित्व यंत्रवत था
तब मानवगणांें में नया कुछ होने की इच्छा हुई
वे पहुंचे हिमगिरिनन्दिनी के पास
स्नानपूर्व उबटन कर रही महामाया ने तब सिरजा उसे
पशुपति ने उसके मस्तक की बलि दी
समा गया वह मानवगणों के मस्तक में बुद्धि बन
खुद बन गया बच्चों का खिलौना गजानन बन
सृष्टि फिर वही नहीं रही जो थी
बलि होना सबमें समा जाना है
वह सुन्दर सुललित शिशु मस्तक तुममें है, मेरे शिशु, तुममें
वह तुम हो, तत्वमसि
जब सब कुछ फिर यंत्रवत होने लगे
बुद्धि छीजने लगे
तुम भी अपने मस्तक की बलि देना
प्रज्ञा बनकर सबमें समा जाना
मत्र्यलोेक के किसी कानून के तहत पेटेण्टेड नहीं है तुम्हारा मस्तिष्क
ब्रह्माण्डीय ऊर्जा ही उसका जेनेटिक मेटेरियल है
किसी विषुवतीय जंगल में सीमाबद्ध नहीं
सर्वव्यापी है वह
बलि ही वह तकनालाजी है जो उसे प्रज्ञा में रूपान्तरित करती है
प्रज्ञा का कोई स्वत्वाधिकार नहीं होता, कोई शुल्क नहीं होता, कोई अंह नहीं होता
आशा-निराशा, राग-द्वेष सब से परे वह सिर्फ प्रज्ञा होती है
सबद ऩुस्तिकारू5 प्रसन् न कुमार चौधरी की लम् ब कवििा 17
ज्ञानरत कर्मरत प्रवाह बन सबमें समा जाना
यही जीवन है
इतना कह कमला मुझे ले आयी विकराल कौशिकी के तट पर
बोली --
इसकी रक्षा मत करना, बहन
अपनी रक्षा आप करेगा यह
फिर महाविद्या कमला अंतर्धान हो गयी
मैं जन्म ले चुका था
किसने देखा जीवन के पार
सब कुछ यहाँ रहस्याच्छादित
एण्ड वी फ्लोट अपॉन अ स्ट्रीम आॅफ लीजेण्ड 9
3
आरम्भ में अन्न था
अन्न की भूख थी@भूख की आग थी@आग की विनाशलीला थी
विनाश की विद्रूपताएं थीं@ विद्रूपताआंे से भरा संसार था
संसार थे तो सपने थे
सपनों से जुनून थे@ जुनून से रक्त थे@ रक्त से रक्तबीज थे
रक्तबीज से रक्तरंजित जीवन था@ उस जीवन से रक्ताक्त मन थे
रक्ताक्त मन से युद्ध था@ युद्ध से प्रलय था
आरम्भ में अन्न था
अन्न से धन था@ धन से लिप्सा थी@ लिप्सा से लीलाएं थीं
लीलाओं से आसक्ति थी@ आसक्ति से वैमनस्य था@ वैमनस्य से क्रूरताएं थीं
विद्रूप संसार
युद्ध संसार
क्रूर संसार
कोसी का बहाव मुझे इसी संसार में बहाए जा रहा था
तब एक गांव दिखा
लोग उसे नदी घाटी सभ्यता कहते
उस सभ्यता की बाहरी दीवार पर एक नन्ही गौरेया बैठी थी
वह भूख थी -
कोसी के मैदानों से इथियोपिया तक पसरी
भूख थी और अन्न की महिमा थी
वह हड़प्पा से चलकर हार्वर्ड तक
कुरू-पांचाल से कैम्ब्रिज तक आयी थी
सबद ऩुस्तिकारू5 प्रसन् न कुमार चौधरी की लम् ब कवििा 18
भूख थी और भूख पर अनुसंधान थे
अनुसंधान सूर्य थे भूख धरती
यहाँ भी अनुपात वैसा ही था
एक अनुसंधान में हजारों भूख समा जाती
अनुसंधान भूख पर प्रकाश डालते
प्रकाशमान भूख एफ्रोदिते 10 से भी खुबसूरत दीखती
भूख का वीभत्स रस श्रंृगार रस में रूपान्तरित हो जाता
यह एक क्रांतिकारी खोज थी
ऊर्जा रूपान्तरण की तरह यह रस रूपान्तरण के सिद्धान्त की पुष्टि थी
भूख थी और अन्न ब्रह्म था
एतावद्वा इदं सर्वमः
अन्नं चैवान्नादश्च 11
अकाल था और खेतों मे लहलहाती बालियां थी
बन्दूकधारी वीभत्स चेहरे थे
और गांव का मनमोहक लैंडस्केप था
जो कविता से कैमरे और केबल टीवी तक छाया था
लाशें थीं
और गुनगुनाती धूप थी, सही एंगल्स थे, सलोने क्लोजअप्स थे
दूर कहीं तन्हा दुनिया में जाते लांग शॉट्स थे
नन्ही गौरेया की चोंच में फंसा अन्न का दाना
सूखी धरती की दरारों मंे कहीं खो गया था
समुद्र होता तो अगस्त्य उसे पी जाते
लेकिन यहां दरारें थी
जो ईसीजी की रेखाओं की तरह धरती पर खिंची थी
गोया धरती के भग्न हृदय की धड़कन ही सतह पर उभर आयी थी
विष्णु ने मूषकावतार लिया
खोद डाली उसने चैलेंजर डीप से गहरी सुरंग
अन्न का वह दाना नहीं मिला
लोगों ने ग्यारहवें अवतार की विफलता देखी
देखा भूख का दाह
चिड़ियाँ उड़ी - आग की लपटें उड़ाती
व्रात्यों की धरती से बैस्तील तक
पीटर्सबर्ग से चिङकाङशान पहाड़ों तक
वह उड़ी - उसके विशाल डैनों की फड़फड़ाहट से धरती कांपी
एंडीज से किलिमंजारो तक
सबद ऩुस्तिकारू5 प्रसन् न कुमार चौधरी की लम् ब कवििा 19
विपन्न संसार
विद्रोही संसार
विध्वंसक संसार
नन्ही जान इसी संसार के गलियों-चैबारों में उड़ती रही
सभ्यता की वीथियों में उसने विचारों के अण्डे जने
सर्वे भवन्तु सुखिनः से सर्वहारा अधिनायकत्व तक
यरूसलम की रोती दीवारों से उसने करूणा के सुसमाचार सुने
टेम्स के किनारे भव्य डिपार्टमेण्टल स्टोर्स की सीढ़ियों पर
उसने बाजार की हकीकत देखी
रेगिस्तानी रास्तों पर
मुहम्मद बिन गजाली ने उसे पेट्रोडॅालर की दुनिया दिखायी
चार्ली चैप्लिन की फिल्मों से निकलकर वह कोसी किनारे
नचारी गाते भिखमंगे साधुओं के हुजूम में शामिल हो गयी
हे भोला बाबा केहन कयलौं दीन
युग बदले वह उड़ती रही
सर्पीले मार्ग पर कभी ऊपर कभी नीचे
कभी उŸार कभी दक्षिण
कभी पूरब कभी पश्चिम
वह दिएन बिएन फू से उड़कर दोई मोई के जमाने में आ पहंुची 12
आरंभ में अन्न था
अन्न का अभाव था
अभाव से वायदे थे@ वायदों की फसलें थीं
आरंभ में अन्न था
भाग्य से@जन से@ अन्न से किये वायदे थे...........................
दरारों में छिपे अन्न के दाने और उस चिड़िया की चोंच के बीच
जनतंत्र का भूगोल था
उसने अपने स्ट्रेटेजिक और ट्रेड विंड्स थे
अपने स्ट्रेट्स और स्टेपीज थे
अपने वन्यजीव थे अपनी दुर्गम घाटियां थीं
अपने सिम्पेथी वेव्स थे
थे अपने शिकार और शिकारी
लेकिन मेरी नन्ही चिड़िया इन्सानियत का वह इतिहास थी
जनतंत्र का भूगोल कई जगह जिसकी विपरीत दिशा में जाता था
सबद ऩुस्तिकारू5 प्रसन् न कुमार चौधरी की लम् ब कवििा 20
वह आकर बैठ गयी मेरे करीब
मैंने अपने किशोर कोमल हाथ उसकी ओर बढ़ा दिये
कहा --
मेरी इन भाग्य रेखाओं को देखो
रेखाओं का खेल नहीं है जीवन
वह तो काफ्का के किले की किसी अंधेरी कोठरी में
फाइलों की गुमनाम भीड़ में
या
लोककथाओं में अक्सर पाये जानेवाले
राक्षसों की मुट्ठियों मंे कैद है
इन बेमानी रेखाओं को कुरेदो
शायद तुम्हें अन्न का टुकड़ा मिल जाये@ और
मुझे अपनी रेखाएं खुद गढ़ने का बहाना
मेरे लहूलुहान हाथों से श्रम के नये बीज अंकुरित हुए
देखते-देखते मेरी सख्त हथेलियों पर उनके पौधे लहलहाने लगे
मेरी अनामिका के सिरे से निकली नील घाटी की नहर
चन्द्रमा के क्रेटरों से जा मिली
उभर आया मेरी हथेलियों पर श्रम का चतुर्आयामी रूप 13
कृष्ण के विराट रूप की तरह
और सचमुच
मेरी रेखाओं के नीचे
खून से लथपथ अन्न का एक टुकड़ा था
बिल्कुल चन्द्रमणि की तरह
उसने फिर मेरे हृदय को कुरेदा
रक्तरंजित धमनियों से विद्रोह के बोल फूटे
संघम् शरणम् गच्छामि का उद्घोष हुआ
वहाँ अन्न का दूसरा टुकड़ा था
बिल्कुल नीलमणि की तरह
फिर बारी आयी मेरे मस्तिष्क की
सृजन की नयी तरंग निकली
वहां अन्न का तीसरा टुकड़ा था
बिल्कुल पारसमणि की तरह
श्रम संसार
हृदय संसार
सृजन संसार
चिड़िया अन्न का दाना पा प्रफुल्लमन इसी संसार में देर तक उड़ती रही
मैं बहता रहा बहता रहा बहता रहा
भूख से परे भी दुनिया थी

4.
मैं कश्यप और अदिति की संतान
द्वादश आदित्य
ऋष्यश्रंृग और उग्रतारा की धरती से
उग्रवाम@ उग्रकाम की आग में तपता बहता
न मालूम कितनी नदियां पार करता
कितनी पगडंडियां नापता
कितने गाँवों नगरों महानगरों की धूल फांकता
हजार-हजार चूल्हों की आंच
हजार-हजार हाथों के स्पर्श
हजार-हजार संकल्पों की शक्ति
हजार-हजार ख्वाबों के दृश्य दिल में लिये
हजार-हजार बलि का साक्षी
आज यहां बैठा हूँ विशाल स्तूप की दीवार से पीठ टिकाये
नार्थर्न ब्लैक पॉलिश्ड कटोरे में
सारिपुत्र को भिक्षा में मिले चावल के कुछ दाने लिये
मैंं
सनातन भिक्षु
कभी कुछ मांगा नहीं
फिर भी दिया गया
थोड़ी सी रोटी थोड़ा सा साग
थोड़ी सी छत थोड़ी सी घूरे की आग
थोड़ी सी चांदनी थोड़ी सी रात
थोड़ा सा दिन थोड़ा सा प्यार
थोड़ा सा स्पर्श थोड़ा सा साथ
थोड़ा सा मान थोड़ी सी मुस्कान
इन्हीं टुकड़ों से मैंने बनायी एक रंगीन सुजनी
लेटकर उसपर मैंने बुना थोड़ा सा ख्वाब
टुकड़ों की भी चाहना होती है
और चाहने की कोई सीमा नहीं होती
मैं सनातन भिक्षु
इन थोड़े-थोड़े टुकड़ों को
अपने थोड़े-थोड़े ख्वाबों को भी
बार-बार गंगा में बहता आया हूँ
पूरी शिष्टता और संजीदगी के साथ
क्योंकि आज तक किसी ने नहीं देखी
विदाई के वक्त मेरी नम आँखंंे
मेरी चाहत का दीवानापन
मेरे जज्बातों का जुनून
सबद ऩुस्तिकारू5 प्रसन् न कुमार चौधरी की लम् ब कवििा 22
कहीं भीतर पत्थर की पिरामिड है मेरे जिस्म में
उसका एक गुप्त द्वार है
कभी आना देखना कुछ भी ममिफाइड नहीं
सबकुछ सजीव है वहां
वही चंचलता वही चपलता
सासों की वही गरमाहट वही लय वही गति
वही मान वही अजनबीपन वही बेगानगी
वही मुस्कान वही अरमान
एक एक तह में ठहरा एक एक व्यतीत क्षण
मैं
सनातन भिक्षु
कभी कुछ मांगा नहीं
फिर भी दिया गया
ढ़ेरों बंदिशें ढ़ेरों अपमान
ढ़ेरों घाव ढ़ेरों निशान
बन्दूकें
घुप्प अन्धेरी रात में गोलियों की खौफनाक आवाज
चीख जो रह-रहकर तेज होती जाती
फिर एक उमसभरा गहरा सन्नाटा सबकुछ ढ़क देता
सलाखें
सलाखों से परे पागलों का विलाप
पागलों से परे लाशों का अम्बार
लाशों से परे गिद्ध और गिद्धों से परे
फिर वही स्याह शून्य आकाश सबकुछ ढ़क देता
सारा अन्याय सारा अत्याचार सारा आंतक सारा खून सारा साक्ष्य
एक अभिशप्त समय की मार
जब आदमी होना अपराध होता है
जब परिचय और सम्मान
बाथरूम की टाइल्स का, ओहदों की हदों का, भग्न किलांे की र्इंटों का
मोहताज होता है
अपरिचय का दंश
उपेक्षा और नफरत से भरी निगाहों की मार
कहीं भीतर एक स्वचालित वैक्यूम क्लीनर है मेरे जिस्म में
कभी आना देखना कुछ भी नहीं है वहां
न कोई गिला न कोई शिकवा
न कोई घृणा न कोई कटुता
प्रतिरोध की आग से नहीं चलता है मेरा तन
प्रतिहिंसा के भाव में नहीं रमता है मेरा मन
प्रतिक्रिया की भाषा नहींं जानता मेरा वचन
सबद ऩुस्तिकारू5 प्रसन् न कुमार चौधरी की लम् ब कवििा 23
मैं सनातन भिक्षु
कभी कुछ चाहा नहीं
क्या कभी चाहा गया ?
चाहने से भी बड़ी होती है चाहे जाने की तृष्णा
देखने से भी बड़ी होती है देखे जाने की चाहना
सुनने से भी बड़ी होती है सुने जाने की चाहना
कहने से भी बड़ी होती है कहे जाने की चाहना
समझने से भी बड़ी होती है समझे जाने की चाहना
आदमी होने से भी बड़ी होती है भीड़ से घिरे होने की चाहना
क्या तुम देखे गये ?
क्या तुम सुने गये ?
क्या तुम कहे गये ?
क्या तुम समझे गये ?
क्या तुम भीड़ से घिरे ?
क्या किसी की आंखे तुम्हारी आहट से खुलीं
क्या किसी शकुंतला को तुम्हारी अंगूठी मिली
क्या कोई वासवदŸाा तुम्हारे स्वप्न में उतरी
क्या तुम लाल कालीन पर बिछे फूलों को रौंदते जयजयकार के बीच से गुजरे
जिन्दगी एक जलजला है
चाहने और चाहे जाने का
चाहने के जुनून और चाहे जाने के अन्तहीन इन्तजार का
मेरा साथी भिक्षु कांप उठा
क्या तुमने अपना कर्म किया सारिपुत्र
क्या तुमने अपना फर्ज निभाया
क्या तुमने वह देखा जो तुम्हें देखना चाहिए
क्या तुमने वह सुना जो तुम्हे सुनना चाहिए
क्या तुमने वह कहा जो तुम्हें कहना चाहिए
क्या तुमने भीड़ से घिरकर भी भीड़ के उन्माद का शमन किया
चाहने और चाहे जाने की तृष्णा का शमन किये बिना
तुम यह कर भी कैसे सकते
जीवन-तृष्णा और जीवन-कर्म
दोनों सच हैं
सबका समय है सबकी सीमा है
एक व्यक्ति को चलाती है दूसरी सृष्टि को
अपना मार्ग चुनो
अपने मार्ग पर चलो
चुनने और चलने का साहस करो तुम
सबद ऩुस्तिकारू5 प्रसन् न कुमार चौधरी की लम् ब कवििा 24
इसी आत्ममंथन मंंे बीत गया चातुर्मास्य
मैंं स्तूप से निकलकर नीचे उतरा
वहां सिमटी सिकुड़ी कंडेन्स्ड दुनिया थी
जिसे पैदल भी कुछ ही घंटों में नापा जा सकता था
5
मस्तिष्क की सृजनशक्ति का चमत्कार थी यह दुनिया
सामने सगरमाथा शिखर पर एक रिवाल्विंग कैफेटेरिया था
बैठे थे जिसमेे आॅक्सीजन मास्क लगाये कई भद्रजन
गगनचुम्बी इमारतें थीं कतारों में खड़ी
जगमगाती सड़कें थीं चिकनी चैड़ी
दौड़ रही थीं उन पर सुपर कंडक्टर इंजिन से युक्त गाड़ियां
जगह जगह लगे म्यूजिक सिस्टम से
कार्लोस गार्डेल के रचे जिंगल्स की धुन बज रही थी
थिरक रही थीं जिनपर सायमा झील के किनारे
वृŸााकार खड़ी उरांव लड़कियां
विक्टोरिया जलप्रपात के किनारे
डॉन जुआन ने खोल रखा था सेविल के सिल्क शॉल का शो रूम
जोविक के भूमिगत आइस हॉकी स्टेडियम में 14
एल्विस प्रिस्ले गा रहे थे मुंडारी गीत
नोरोजोनोम बरसिड़ नांगिन
लंदा जगर हिरती-पीरती
ने जीवोन गतिड़................
ने जीवोन काहो बदलाओं
कुंबर चाटु पोवा जान रे
कुंबर तात का रूबाड़ा
ने जीवोन गतिड़
ने जीवोन का ही नमोगा ................15
भीड़ पागलों की तरह झूम रही थी
कोवलम बीच पर
एक हंगारी बेलेरीना सबको मंत्रमुग्ध किये थी
उधर अमेजन के जलमहल में
वसंतसेना प्रस्तुत कर रही थी मोहिनी अट्टम
सबद ऩुस्तिकारू5 प्रसन् न कुमार चौधरी की लम् ब कवििा 25
सजी सजायी जगमग करती यह दुनिया
सचमुच एक टेक्स्टबुक दुनिया थी
सबकुछ का अपना नियत समय था, सब कुछ की अपनी नियत जगह थी
हर काम के अपने अंदाज थे, अपनी भाषा थी
अपने संकेत थे, अपने नियत लोग थे, अपनी आचार संहिता थी
अपने कर्मकांड थे, अपने अछूत थे, अपने म्लेच्छ थे
अपने काफिर और अपने हेरेटिक थे
यह मनुष्य की अपनी सृष्टि थी
विज्ञान का चमत्कार था और दुनिया एक थी
बच्चे एक ही गीत गाते
एक ही किताब पढ़ते, एक ही फिल्म देखते
उनके नायक खलनायक एक थे, उनके खिलौने एक थे
उनके अभिवादन की शैली एक थी
उनके हंसने-मुस्कुराने-बतियाने के अंदाज एक थे
बस्तों के बोझ से उनकी पीठ एक जैसी ही झुकी थी
टेक्स्टबुक दुनिया के वे टेक्स्टबुक बच्चे थे
बड़ों की आकांक्षाएं@उनके सपने एक थे
उन्होंने अपनी एकता बच्चों पर थोप दी थी
विकसितों की आकांक्षाएं@उनके सपने एक थे
उन्होंने अपनी एकता अविकसितों पर थोप दी थी
मनुष्यों की आकंाक्षाएं@उनके सपने एक थे
उन्होंने अपनी एकता प्रकृति पर थोप दी थी
दुनिया एक थी
उसे सिर्फ बच्चों की अनुशासनहीनता
अविकसितों के आक्रोश
प्रकृति के प्रकोप से खतरा था
टेक्स्टबुक दुनिया थी
और उसका सर्वोत्कृष्ट टेक्स्टबुक उत्पाद थे नवमानव
जो विज्ञानकथाओं और कॉमिक्स की किताबों से निकलकर
हकीकत बन चुके थे
सबद ऩुस्तिकारू5 प्रसन् न कुमार चौधरी की लम् ब कवििा 26
कम्प्यूटर सिमुलेशन, जेनेटिक्स और रोबोटिक्स की
नवीनतम सृष्टि थे ये विलक्षण जीव
मनुष्य से अधिक दक्ष
अधिक तेज
उनके मस्तिष्क के एक कोने में
इमली के दाने जैसे डिस्क में
सारी सूचनाएं सारा पुस्कालय सारा शब्दकोश था
उनकी संतति सबकुछ ग्रहण करती जाती वंशानुगत
वे खाते थे धूप, पीते थे समुद्र का खारा जल
ध्वनि और वायु प्रदूषण था उनपर बेअसर
अपनी बाह्य ओजोन त्वजा की बदौलत
वे चिलचिलाती धूप में भी मजे से काम करते
वे नयी धरती के नये मानव थे
दर्शन के सारे सवाल जिनके लिए
बस सिंटेक्टिकल सवाल थे 16
इन नवमानवों और मानवों में बस एक ही फर्क था
नवमानवों के पास मन नहींं था
इसलिए मनजनित भी कुछ नहीं था
अय, सर, व्हेयर लाइज दैट (कांशन्स) ? आइ फील नॉट
दिस डीइटि इन माइ बूजम.................17
इस दुनिया की अपनी बीमारियां थीं@अपने उपचार थे
सबसे नयी बीमारी थी कम्प्यूटर रेबीज
जो कम्प्यूटरांे के एक रसायन के
मानवरक्त के संसर्ग में आने से होती थी
इस बीमारी से ग्रस्त लोगों को देखकर
लोग कहते है - इसे कम्प्यूटर ने काटा है
ओर ऐसे लोगों की तादाद कम न थी
टेक्स्टबुक दुनिया थी
टेक्स्टबुक बच्चे थे
टेक्स्टबुक लोग थे
टेक्स्टबुक प्रकृति थी
सबद ऩुस्तिकारू5 प्रसन् न कुमार चौधरी की लम् ब कवििा 27
वन नहीं थे, पार्क थे
पेड़ नहीं थे, विभिन्न ज्यामितीय आकारों में कटी-छंटी वनस्पतियां थीं
वन नहीं थे तो वन से जुड़ी कहानियां भी नहीं थीं
त्योहार भी नहीं थे
वन एक रहस्य था बरमूडा त्रिकोण की तरह
जहां राजकुमार अक्सर गुम हो जाया करते
फिर बहुत दिनों बाद राजधानी लौटते
ब्रह्मर्षि बनकर
बुद्ध बनकर
या कादम्बरी को साथ लेकर
तितलियाँ नहीं थीं
तितलियों के पीछे भागते बच्चे नहीं थे
तितली रानी तितली रानी की जगह
लंदन ब्रिज इज फालिंग डाउन ने ले ली थी
गांव नहीं थे
इसलिए गांव की औरतें भी नहीं थीं
लूव्र संग्रहालय में लोग उन्हें देखते
और उन्हें अमृता शेरगिल की औरतेंं कहते
मौसम नहीं थे
इसलिए औरतंे नहीं गाती थीं बारहमासा
फागुन हे सखि सब रंग बनायल
खेलत पिया के संग हे
ताहि देखि मोरा जियरा ज तरसय
काहि पर डारू हम रंग हे
खंजन नहीं आते थे
इसलिए कोई खंजन-नयन भी नहीं था
सबद ऩुस्तिकारू5 प्रसन् न कुमार चौधरी की लम् ब कवििा 28
दुनिया एक थी
उसके नीचे दफ्न थी कई बहिष्कृत@ विस्मृत दुनियाएं
यह बहिष्कृत@विस्मृत दुनिया बार-बार सिर उठाती
लोककथाओं में@लोकगीतों में@लोकनायकों मंे
आकाश से आहिस्ता-आहिस्ता उतरती उर्वशी
मनुष्यलोक में चार शरदों की रातें बिताकर
थोड़ा सा घी चखकर पुत्र जनकर
फिर लौट जाती स्वर्गलोक में- प्रथम उषा सी
अपनी समुद्री यात्राओं में बार-बार भटक जाता सिन्दबाद
पनाह लेता अज्ञात द्वीपों में
जहां विशालकाय बाज अपने पंजों में लेकर उड़ते
उतने ही विशालकाय सांप
पाताललोक में बैठा ओसिरिस 18
स्वप्नलोक की आत्मा
मां इश्तर
सब रखते लेखा-जोखा हमारे कर्मों-दुष्कर्मों का
सुखावती का अमिताभ
कितने जन्मों, कितनी कहानियों से गुजरकर
धारण करता निर्माणकाया , बनता सिद्धार्थ गौतम
कार्तिक पूर्णिमा को शापमुक्त होती सामा
वह लड़की अब भी चलनी में भरकर लाती पानी
विदेश में भटकते जिसके सात भाई
कटैया के जंगल में मारा जाता
जोगिआ जांजरि का दीना भद्री
गदहे पर नसरूद्दीन अब भी घूमता
सम्राट की मूर्खता पर बीरबल हंसता
लोग अवाक हो देखते तेनाली रामा का न्याय
आते गोनू ओझा के पास पूछने
खेतों की रखवाली का उपाय...............
फिर अचानक आता डोनाल्ड डक
उसके विशालकाय पंखों में ढक जाता सबकुछ
सारा का सारा सिन्दबाद सारी की सारी उर्वशी
सारा का सारा लोकमन सारी की सारी लोकबुद्धि
सारा स्वर्गलोक सारा स्वप्नलोक
सारा मत्र्यलोक सारा लोकलोक
विज्ञान से दुनिया एक थी
पाताल में केबल्स
धरती पर माइक्रोवेव टावर्स
अन्तरिक्ष में सेटेलाइट्स
इस एकता के प्रतीक थे
सबद ऩुस्तिकारू5 प्रसन् न कुमार चौधरी की लम् ब कवििा 29
लेकिन
मन से दुनियां बंटी-बंटी थी
विल्नियस से बेरूत तक
सारायेवो से लॉस एंजेलिस तक
पाटलिपुत्र से प्रिटोरिया तक
एक खूनी युद्ध था
जो कबीलों से पृथ्वी सम्मेलन के युग तक
वसुधैव कुटुम्बकम् से विश्वनागरिक के जमाने तक
अनवरत चलता आ रहा था
दुनिया एक थी और युद्धरत थी
एक जैसी स्वचालित राइफलंे थीं, एक जैसे नकाब थे
एक जैसी टैंकभेदी मिसाइलें थीं, एक जैसे रॉकेट लांचर थे
एक जैसे बम गिरते, एक जैसी इमारतें गिरतीं
हर जगह हरेक मां एक जैसी ही छाती पीट पीटकर रोती
बच्चे एक जैसे ही दम तोड़ते
दुनिया एक थी और युद्धरत थी
दैन डू यू, ओ टाइरियन्स, पस्र्यू हिज सीड विद योर हेटेªड
फॉर आल एजेज टु कम,........लेट नो काइंडनेस नॉर ट्रूस बी
बिटवीन द नेशंस .............आइ इन्वोक द एनमिटि आॅफ शोर
टु शोर, वेव टु वाटर, सोर्ड टु सोर्ड य लेट देअर बैटल्स गो
डाउन टु देयर चिल्ड्रेन्स चिल्ड्रेन 19
सहसा चांद से एक लड़की उतरी
नीलाभ ट्यूब टॉप पर सी-थ्रू फ्लोरल ब्लाउज पहने
हाय कहती हुई वह मेरे करीब आ गयी
हम साथ-साथ चल सकते है - मुस्कुराकर कहा उसने
घबडा़ना नहीं, मैं कुछ नहीं पूछूंगी
कौन हो कहां से आ रहे हो कहां जाओगे कुछ नहीं
होना आना जाना ये शब्द मेरे शब्दकोश में नहीं
हम अभी साथ-साथ चल रहे हैंं क्या इतना ही पर्याप्त नहींं
उसके घने लम्बे बाल थे आकाश में लहराते
वनहीन धरती पर थे वन का आभास देते
ग्रीनहाउस प्रभाव के विरूद्ध अकेले जूझते
सबद ऩुस्तिकारू5 प्रसन् न कुमार चौधरी की लम् ब कवििा 30
तुमने जो देखा वह शब्दों का कहर है
शब्द और कुछ नहीं पाखण्ड का सफर है
पाशविक हंैं हमारी मूल वृतियां
छिपाती उन्हें शब्द की अठखेलियां
सभ्यता की हमारी, उम्र जितनी बढ़ती गयी
शब्द के शॉल में उतनी वह लिपटती गयी
उसने पर्स से एक पाउच निकाला, कहा@ बदन के खुले हिस्से पर यह
क्रीम मल लो@ पराबैंगनी किरणों से बचायेगी तुम्हें@ जबसे ओजोन की
परत छीजने लगी है@ इसे लगाये बिना लोग नहीं निकलते@ बाजार में
इसकी कई वेरायटियां हैं@ लेकिन यह मेरा पसंदीदा हैै@ क्योंकि इसमें
है रातरानी की खुशबू@ रातरानी जो अब कुछेक वनस्पति उद्यानों को
छोड़ कहीं नहीं मिलती
कुल का गौरव, रक्त की पवित्रता
राज्य का हित, जन की अस्मिता
राष्ट्र का उत्थान, जनता का तंत्र
न्याय का शासन, अहिंसा का मंत्र
धर्म का पालन, सभ्यता का प्रसार
वंचितों का हक, शान्ति का प्रचार
ऐसे ही शब्दों की आड़ में
दाशराज्ञ युद्ध से आॅपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म तक
हमने कितनी वीभत्स लड़ाइयां लड़ीं
धन के लिए, स्त्री के लिए, सŸाा के लिए
शब्द ज्यों ज्यांे परिष्कृत होते गये
युद्ध उतने ही भयंकर होते गये
संहार उतने ही प्रलयंकारी होते गये
नरमुंड़ो के ढ़ेर उतने ही ऊँचे उठते गये
पत्थर के औजारों से प्रक्षेपास्त्रों तक
यही है आदमजात का सफरनामा
गुफाओं मेें शिकार की चित्रलिपि से ब्रीफकेस में बन्द न्यूक्लियर कोड तक
यही है हमारी भाषा की विकासयात्रा
हां बीच-बीच में ऋचाएं हंैं, काव्य हैं
भास हैं, कालिदास हैं
कहानी औ उपन्यास हंै
शेक्सपीयर हैं, इब्सन हंै
गोएठे और इमरसन हैं
लेकिन वे हमारे पशुत्व के बारे में सिर्फ भ्रम जगाते हैं
कुशन हंै वे जिनपर हमारे वहशी भाव विश्राम पाते हैं
हम वही हैं जो थे - पाखण्डी पशु
स्वार्थी, हिंस्र, बर्बर, रक्तपिपासु
सबद ऩुस्तिकारू5 प्रसन् न कुमार चौधरी की लम् ब कवििा 31
ह्यूमनकाइण्ड इज अ ‘कंग्रीगेशन आॅफ हिपोक्रिट्स
दे कन्सीव मिस्चिफ,एण्ड ब्रिंग फोर्थ वेनिटी, एण्ड देयर बेली
प्रिपेयरेथ डिसीट, 20
लोग हुए
महात्मा, मसीहा और पैगम्बर हुए
जिन्होंने शानदार शब्द रचे-गढ़े
उन शब्दों के अनुरूप खुद ढ़ले
कोशिश की कि दुनिया भी ढ़ले
लेकिन सब के सब व्यर्थ गये
हमारा पशुत्व सच है अपरिवर्तनीय
उनके प्रयास झूठ है अविस्मरणीय
सबके अनुयायियों ने पहन रखी है नरमुंडों की माला
वे अब पाते हैं नारकोटिक्स से निर्वाण
गणिकाएं जिन्होंने ली थीं परिव्रज्या तथागत के हाथों
डालरों में बिकती हैं शेख के हाथों
महानगरों में कॉमशियल सेक्स वर्कर्स कहलाती हैं
सभी फेंकते पत्थर दूसरे पर
कोई नहीं झांकता अपने भीतर
पुरामानवों से नवमानवों तक
मानवजाति ने पूरा कर लिया है अपना एक च्रक
महात्माओं ने गढ़ना चाहा था
निस्वार्थ सत्यनिष्ठ नया आदमी
लोगों ने गढ़ा एक दूसरा नया आदमी
एक टेक्स्टबुक पालतू पशु
शायद दोनों जरूरी हैं@ पूरक हंै
लेकिन रक्त्पिपासु पाखण्डी पशुओं के हाथों
टेक्स्टबुक पालतू पशु
प्रलय के संकेत हैं
वह एक पब्लिक टेलिफोन बूथ में घुस गयी@ कुछ बटन दबाये
कुछ संदेश दिये@ थोड़ी देर बाद कुछ वाहन आये@ वह बैठ गयी
गाड़ी मंे, कहा@ कल फिर मिलूंगी पृथ्वी सभागार में
सबद ऩुस्तिकारू5 प्रसन् न कुमार चौधरी की लम् ब कवििा 32
6
टी ब्रेक 21
कविता में गद्य का प्रवेश
(सिर्फ थर्टी प्लस लोगों के लिए)
मॉम, आइ नो
आइ नो
यू आर वरिड अबाउट माइ डेटिंग्स
माइ लाइफस्टाइल एण्ड माइ फ्रेण्ड्स
बट मॉम
आइ डु नोट होल्ड द ओल्ड जेनरेशन इन हाई एस्टीम ईदर
दिस बॉडी इज रीअल
एवरीथिंग एल्स इज इफेमेरल
वन नीड्स टु कीप हिज@हर बेली फुल
एण्ड लिबिडो सैटिस्फाइड
टु स्टे फिट एण्ड इफीशिएण्ट एट हिज@ हर वर्कप्लेस
ह्यूमनकाइण्ड, मॉम, इज बाइ नेचर प्रोमिस्कुअस
मेन एण्ड वूमेन मैरी ट्वाइस, थ्राइस, फोर टाइम्स ................इन देअर लाइफटाइम
एण्ड देेन देअर आर प्रीमैरिटल एण्ड एक्स्ट्रामैरिटल रिलेशंस
एण्ड देअर आर लेस्बियां एण्ड गे क्लब्स
एण्ड एब्यूजेज एण्ड रेप्स
एण्ड इरोटिक आॅडियो-विजुअल गैजेट्स
एण्ड इन्फ्लैटेब्ल लाइफसाइज डॉल्स एवेलेब्ल इन द मार्केट................
हयूमनकाइण्ड्स सेक्सुअल बिहेवियर, मॉम, इज वर्स दैन एनिमल्स
एण्ड इफ यू सप्रेस योर नेचुरल अर्जेज
यू हैव अ होस्ट आॅफ कम्प्लेक्सेज एण्ड कम्प्लिकेसीज
ईडिपस, एलेक्ट्रा, यमी, भीष्म ......
एंक्जाएटी न्यूरोसिस, सैडिज्म, मैजोकिज्म,सैडो-मैजोकिज्म, मैटल डिसॅाडर्स.........
अ होल रेस आॅफ किलनिसिस्ट्स थ्राइव आॅन आवर हिपोक्रिसी
आॅन आवर फाल्स सेन्स आॅफ सिन एण्ड कंडेम्नेशन
सिमिलरिली मॉम
ड्रेस, लाइक सिविलाइजेशन, इज द बिगिनिंग आॅफ आवर हिपोक्रिसी
एवरीन नोज व्हाट इज हिडन इन द क्लॉथ्स
हेंस हाइडिंग इज हिपोक्रिसी
ड्रेस इज नोट अ मीन्स टु हाइड, मॉम
इट्स अ मीन्स टु एक्सपोज वन्स बॉडी इन अ मोर एट्रैक्टिव मैनर
कीपिंग इन व्यू द ओकेजन, लैंडस्केप, सीजन, मूड एण्ड वन्स ओन फीगर
इट डिपेण्ड्स आॅन यू व्हेदर यू एक्सपोज योर ब्रेस्ट्स, वेस्टलाइन आॅर प्यूबिक हेअर
सबद ऩुस्तिकारू5 प्रसन् न कुमार चौधरी की लम् ब कवििा 33
लाइक टैक्स हैवेन इन द आइल आॅफ द मैन एण्ड केमैन आइलैण्ड्स
हयूमनकाइण्ड हैज सिंस लांग क्रिएटेड इट्स ओन सैक्स हैवेन्स
आइ अम जस्ट कमिंग फ्रॉम ल’ टेªपीज मॉम
मेन रिड्युस्ड अस टु थर्टी सिक्स ट्वेंटीफोर थर्टी सिक्स सेक्स सिम्बॅल्स
एण्ड सी मॉम, व्हाट वी हैव डन टु देम
वी रिड्युस्ड देम टु थर्टी सिक्स .....................
चॉपर, लव टंªचन, डोंगर, ज्वाय स्टिक एण्ड द लाइक .....................
द एज आॅफ आर्टिफीसिअल यूटेरस इज इन मॉम
एण्ड वी हैव बीन फ्रीड फ्रॉम द बर्डेनसम टास्क आॅफ कन्सीविंग
इट इज नाउ हाइ टाइम टु डिसॉलव द इंस्टीट्युशन आॅफ मैरिज, मॉम
द प्रॉब्लेम आॅफ इन्हेरिटेन्स इज मीनिंगलेस
नोबॉडी इज एनीबॅडीज एअर
एवरीबॉडी इज हिज ओन क्रिएशन
द डे आॅफ इमोशनल टाइ इज नाउ ओवर
सी मॉम
हाड मच सोशली नेसिसॅरी लेबर टाइम हैज बीन वेस्टेड बाइ द ह्यूमनकाइण्ड
इन राइटिंग, रीडिंग, इनैक्टिंग
फाल्स, सेल्फ डेल्युडिंग लव स्टोरिज, लव संाग्स, एण्ड लव प्लेज
इन दैट लेबर टाइम वी वुड हैव बिल्ट आॅवर कॉलोनीज आॅन मार्स
मॉम, हाउ मेनी एक्स्ट्रा मैरिटल रिलेशंस हैव यू इन योर लाइफटाइम
टेल योर सेक्स सीक्रेट्स एण्ड इनलाइटेन योर डॉटर
आइ अम नाउ इंडिपेंडेंट आॅफ यू एण्ड आॅफ एवरीथिंग
कम आॅन मॉम, डांट बी सिली
शेयर दिस फ्रीडम विद मी
सेक्स इज अ बायोलॉजिकल निसेसिटी मॉम, अ बेसिक इन्सटिंक्ट
अ हैैण्डीवर्क आॅफ सर्टेन केमिकल्स विदिन अस, एण्ड जस्ट दैट मॉम
व्हाट मॉम, आइ अम गेटिंग आब्सीन ?
नो मॉम, नो
आब्सीनिटी इज रिजब्र्ड फॉर द नेटिव लैंग्वेजेज सिंस द डे आॅॅफ मैकॉले
देअर इज नथिंग आब्सीन इन इंगलिश
वह लड़की सभागार के एक कोने में बैठी थी
उसने आज हल्के गुलाबी रंग का फिशनेट ओवरब्लाउज पहन रखा था
मानव-भू्रण से बने कॉस्मेटिक्स से उसका चेहरा दमक रहा था
अंधेरे में होने के कारण उसकी मां का चेहरा साफ दिखाई नहीं पड़ रहा था
सबद ऩुस्तिकारू5 प्रसन् न कुमार चौधरी की लम् ब कवििा 34
ओ, तुम आ गये
मां, पूछो इससे
हर पुरूष चाहता है प्रलय
चाहता है सारी दुनिया डूब जाए
और वह बचा रहे
चाहता है विसुवियस बार-बार फटे
और उसके मलबे से सारा शहर सारा गांव सारा जीवन ढ़क जाए
सिर्फ वह बचा रहे
चाहता है एक प्रलयंकारी भूकम्प जिसमें सबकुछ नष्ट हो जाए
सिर्फ वह बचा रहे
और बची रहे कुछ स्त्रियां
ताकि वह आदिमानव बन
फिर से रचे सृष्टि
हर स्त्री चाहती है सब कुछ समा जाए उसमें
सारे पहाड़, सारा जंगल, सारी नदियां, सारे समुद्र, सारे मनुष्य, सारा जीवन
फिर भी कुछ खत्म न हो
एक अनन्त कृष्ण विवर होना चाहती है हर स्त्री
जब यह चाहना उग्र हो उठती है
तब मैं महसूस करती हंू अपने भीतर एक नरभक्षी
टेलीविजन का स्वीच आॅन कर देखने लगती हूं ‘द साइलेंस आॅफ द लैम्ब्स’ 22
मां, महाभारत में मुझे क्या अच्छा लगता है, जानती हो
धृतराष्ट्र आलिंगन
बोलो मां, क्या तुम भी ऐसा महसूस करती हो
मां, हर स्त्री के पतन के पीछे एक पुरूष होता है
मर्यादित पुरूष
बट आइ नॉट अ फॉलेन वूमेन मॉम
आइ नो हाउ टु सरवाइव एण्ड थ्राइव इन दिस एनिमल किंगडम
आइ नो हाउ टु एनज्वाय लाइफ मॉम
आइ वांट टु बी द वूमेन बिहाइंट द फॉल आॅफ मेनी अ मेन
बट मॉम, व्हाइ आर यू नॉट रेस्पॉण्डिंग
????????
!!!!!!!!!!
डिअर, योर मॉम इज डेड
डेथ इज हर रेस्पांस
नो, वह चीख उठी
सभागार में थोड़ी हलचल हुई
सबद ऩुस्तिकारू5 प्रसन् न कुमार चौधरी की लम् ब कवििा 35
अ टाइ हैज ब्रोकन डाउन
यू आर इंडिपेंडेंट आॅफ योर मदर
नाउ योर मदर इज इंडिपेंडेंट आॅफ यू
अ कम्यूनिकेशन हैज ब्रोकन डाउन
यार क्राइ इज द लास्ट वर्ड
या डिअर, योर मॉम इज डेड
बट रिमेम्बर मदर इज अ डेथलेस केटेगॅरी
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
व्हाट! यू आर टॉकिंग इन सेंस्कृट
इट्स रीअली नाउसिएटिंग फॉर मी
इट रिमाइण्ड्स मी आॅफ द फैटेण्ड पंडाज आॅफ बेनारस
आॅफ लीपर्स एण्ड बेगर्स, आॅॅफ डर्ट एण्ड फिल्थ एण्ड बैड स्मेल आॅल अराउण्ड
आइ हेट दिस लैंग्वेज
बट हैड यू बीन एक्वेंटेड विद दिस लैंग्वेज
यू वुड हैव लाइक्ड इट
इट इज द मोस्ट पावरफुल लैंग्वेज आॅफ द लिबिडो
इसी बीच वह फिर चिल्लाने लगी
माइ मॉम माइ मॉम
यस, शी इज नो मोर
योर डिफाएन्स वाज सुपर्ब
हर डेथ सब्लाइम
डिअर, डेथ इज नॉट अ पैसिव बट एन एक्टिव एजेंट
एण्ड आवर एक्जिस्टेंस इज अ सिंथेसिस आॅफ डिफाएन्स एण्ड डेथ
थिंक ओवर बोथ द डिफाएन्स एण्ड द डेथ
थिंक ओवर इट डिअर, थिंक
वह रोने लगी
सभागार में मौजूद छः अरब लोग रोने लगे
वे सदियों तक रोते रहे
उनके आंसुओं से एक सागर बना
वह मृत सागर कहलाया

7
समय जब अल्हड़ होता है
शरीर की एक-एक कोशिका एक-एक ज्वालामुख
जिन्दगी जब काटे नहीं कटती
नींद के पहले और नींद के बाद
किसी का ख्याल जब हटाये नहीं हटता
बातें जब कभी खत्म नहीं होतीं
हृदय जब मीठा-मीठा डर होता है
अपना पूरा वजूद ही जब किसी के अंग-अंग में घुल जाता है
किसी के प्रभामंडल की आंच में मन जब शीतल-शीतल हो जाता है
दिल जब किसी की आहट
किसी की आवाज
किसी की पलकों के उठने से अज्ञात
अव्यक्त
अकल्पनीय धड़कन बन जाता है
तब एल डोराडो में भी कांदिद को चैन नहीं मिलता
कुनेगुन ही सबसे बड़ा सच होती है 23
तब फलसफे भी सुकून नहीं पहुंचाते
‘.............................हैंग अप फिलॉसॅफी !
अनलेस फिलॉसॅफी कैन मेक अ जूलियट ’ 24
तब प्रवाह थम जाता है
रह जाता है भंवर@ तुम्हारी परिक्रमा
क्षण नित्य हो जाता है
सापेक्ष निरपेक्ष
विज्ञान और तर्क के सारे नियम तुम्हारे कदमों मेें होते हैं
मेरा प्रवाह भी थमा है
बात सिर्फ इतनी ही है कि
मैंने प्यार किया है
मैंने प्यार कर त्याग किया
त्यागकर प्यार किया है
मैंने प्यार कर त्यागकर प्यार किया
त्यागकर प्यारकर त्याग किया है
उसे
जिसे मैंने बार-बार देखना चाहा
पर देख न सका
दृश्यसुख से वंचित
जिसे मैंने बार-बार सुनना चाहा
पर सुन न सका
श्रव्यसुख से वंचित
जिसे मैंने बार-बार छूना चाहा
पर छू न सका
स्पर्शसुख से वंचित ...............

वंचनाओं की भूमि पर खड़ा मैं
जानता हूं इन सारे सुखों का मर्म
हां सिर्फ मैं
सनातन प्रेमी
मूक ही जानते है वाणी का सुख
वधिर ही जानते हैं श्रवण का सुख
अन्धे ही जानते हैं दृश्य का सुख
वैरागिनी मीरा ही जानती है कृष्णासक्ति का सुख
दुख जानता है सुख
विरह जानता है मिलन
इकाई जानता है अनन्त
संतानहीन परित्यक्त गंगा लिखती है कोहबर, अहिबातक दीप, जीवन-चक्र 25
हां वंचनाआंंे की भूमि पर खड़ा मैं
मैं ही जानता हूं प्यार का मर्म
वंचना है तो रहने दो
तभी तो महसूस करूंगा तुम्हें रोम-रोम में
क्षितिज है तो रहने दो
तभी तो खत्म नहीं होगा कभी क्षितिजपटी के पार का रहस्य
प्रवाह थमा है तो थमा ही रहने दो
तभी तो परिक्रमा हागी@ डूबना होगा अज्ञात गह्वर में
परिक्रमा होगी तो मौसम होंगे वसन्त होगा
फूल होंगे जीवन होगा
अदृश्य है वह तो रहने दो
तभी तो सपनीली चितवन होगी@ अपलक देखना होगा
तभी तो बातें हांेगी वादे होंगे अन्तहीन सिलसिला होगा
तभी तो जब वह करीब से गुजरेगी तो मलयपवन गुजरेगा
तभी तो मेरी कविता होगी और मैं सनातन प्रेमी होऊंगा
वह रो चुकी थी और मेरे सामने खड़ी थी
मैंने पहली बार उसे देखा भरपूर निगाहों से
माधव की कहब सुन्दर रूप ! 26
हैलो ब्राइटनेस, माइ ओल्ड आॅब्सेशन,
आइ हैव कम टु टॉक विद यू अगेन ! 27
वंचना कभी वांछित नहीं हो सकती
वंचना कभी महिमामंडित नहीं की जा सकती
स्त्री से भागो मत
उसे देखो@ उसे सुनो@ उसे छुओ@ उसे समझो

अन्यथा
हर युग में भारती तुम्हें शास्त्रार्थ में हराएगी
बार-बार परकायाप्रवेश के लिए तुम्हें विवश करेगी
स्त्री से भागो मत उसे साधो
वह आज बदली-बदली सी थी
उसकी मां नहीं थी सभागार नहीं था
वह थी बदली-बदली सी
इस दुनिया में
सनातन प्रेमी होना आसान है
यथार्थ प्रेमी होने से
एकान्त प्रेम आसान है
परस्पर प्रेम होने से
प्यार करना आसान है
प्यार पाने से
याचना नहीं होती कोशिश पाने की प्यार
वह तो स्त्री पुरूष का है नैसर्गिक अधिकार
तुमने त्यागा है अपना अधिकार
केसे पाओगे भला स्त्री का प्यार
या फिर
स्त्रियों ने कर रखा है तुम्हें वंचित प्यार पाने के अधिकार से
और तुमने उसे कर लिया है चुपचाप स्वीकार ?
उठो अपने अधिकार को अभिव्यक्ति दो
मैं खामोश रहंूगी तुम बोलोगे
मैं खामोशी का हक लूंगी तुम अभिव्यक्ति का मान लो
देअर बी थ्री टाइम्स, डिक, व्हेन नो वूमेन कैन स्पीक
ब्यूटीफुल टाइम्स ........................28


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भूख, काम और मस्तिष्क के त्रिशूल पर खड़ी है यह दुनिया
मैंने भूख की हकीकत देखी
काम का क्रीड़ाङ्गण देखा
मस्तिष्क की सृष्टि देखी
भूख, काम और मस्तिष्क के त्रिशूल पर खड़ी है यह दुनिया
जब बिगड़ता है इनका संतुलन तब भूचाल आता है
और यह भूचाल अनवरत चलता आ रहा है
किसने देखा है संतुलित आदमी@ संतुलित दुनिया ?

भूख से अपराध थे
काम से व्यभिचार थे
मस्तिष्क से विध्वंसक साजिशें थीं
दुनिया अपराध, व्यभिचार और साजिशों की दुनिया थी
भूख से बाजार था
काम उस बाजार का श्रंृगार था
मस्तिष्क उसका बिजनेस कंसल्टेण्ट था
दुनिया एक विशाल मंडी थी
जहां सबने कुछ-न-कुछ या सबकुछ दांव पर लगा रखा था
किसी ने धन, किसी ने दिल, किसी ने विचार
बाजार था और सौदे थे
एक मित्र ने एक बार दिल की फॅारवार्ड टेªडिंग की थी
पिटी स्क्रिप बदला स्टोन चिप्स पर दांव लगाया
दूसरे ने एक विचार चुना था
विचार की वह पोनी रेस हार गयी
दूसरे सीजन में उसने पोनी बदल ली थी
दुनिया इसी तरह घाटा-मुनाफा, बुल -बिअर की आंख-मिचैनी खेलती रहती थी
भूख, काम और मस्तिष्क का बाजार थी दुनिया
बाजार से दुनिया एक थी
लेकिन यह विविधता में एकता थी
अलग-अलग बाजारों में
भूख, काम और मस्तिष्क का
पी बटे ई अनुपात 29 अलग-अलग था
कहीं भूख से ज्यादा मुनाफा था, कहीं काम से, कहीं मस्तिष्क से
कहीं भूख की साख ज्यादा थी, कहीं काम की, कहीं मस्तिष्क की
फिलवक्त तो दुनिया खुद एक ब्लूचिप स्क्रिप थी
इस दुनिया के अपने बेकार माल थे@ अपने कचरे थे
पुरूषार्थ, ईमान, कर्Ÿाव्यबोध, प्रायश्चित जैसे शब्दों के
कोई खरीददार नहीं थे
एक प्रतिनिधि सभा ने तो इन शब्दों को
शब्दकोश से हटा देने का विधेयक तक पारित कर दिया था
उसके वैज्ञानिकों ने कचरों को डम्प करने की जगह भी तलाश ली थी
न्यूक्लिअर कचरे की तरह ये कचरे भी रेडियोधर्मी थे
इन्हें सतर्कता से ठिकाने लगाना था
रात में शत्रु के खिलाफ किये गये सैनिक मुहिम की तरह
क्लाउजेवित्ज की हिदायतों के अनुरूप ....................
हां इस दुनिया के अपने शत्रु थे, अपने एनकाउण्टर थे, अपने डर थे.................

भूख से श्रम था
काम से निष्काम प्रेम था
मस्तिष्क से उदात्त सृजन था
दुनिया श्रम, पे्रम और सृजन की दुनिया थी
श्रम से शरीर था@ व्यक्त्वि था
प्रेम से मन था@ पहचान थी
सृजन से सक्षमता थी@ संतत-प्रवाह था@ संस्कृति थी
भूख, काम और मस्तिष्क की संतानों में महासमर छिड़ा था
और दुनिया कुरूक्षेत्र थी
जो हमारे अन्तर्मन से अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं तक फैली थी
किसी ने नहीं देखा था युद्ध का आरंभ
और युद्ध तो अब भी चल रहा था
महासमर था
हमारा व्यक्तित्व@ हमारी पहचान@ हमारी संतति@ हमारी संस्कृति
सब कुछ क्षत-विक्षत था
मैं था और वह लड़की थी
त्रिशूल पर अर्धनारीश्वर की मुद्रा में खड़े थे हम
सहसा कहीं कुछ हुआ
क्या तुमने कुछ महसूस किया
उसने कहा हां
क्या तुमने कुछ सुना
उसने कहा हां
हम सहसा हंसने लगे जोर से और जोर से
अन्तरिक्ष में हमारी हंसी गूंज उठी
फिर भी किसी ने नहीं सुनी हमारी हंसी अर्धनारीश्वर की हंसी
जब एकमक हो जाती है नर और नारी की हंसी
तब कुछ अघटित घटता है
विश्रंृखलता श्रृंखला पाती है
या कोई श्रृंखला किसी विश्रृंखल बियावान में खो जाती है
कुछ होता है
इकाई या तो अनन्त से एकमएक होती है
या अनन्त किसी इकाई में घनीभूत होता है
कुछ होता है अवश्य
शरीर के आवेगों और मस्तिष्क की गणनाओं के बीच
एक अनिर्वचनीय प्रदेश था
वह मन था
मन से मनुष्य थे
मन एव मनुष्याणां ............
लेकिन कितने थे ?
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शारीरिक आवेगों से हम पशु थे
मस्तिष्क की गणनाओं से हम एक संगणक थे@ एक नवमानव
आवेगों और गणनाओं में आज तक भटकते आये हैं हम
कब मन का कहा माने हैं हम
मन से अनन्त था@ अमूर्त था
अनन्त से@ अमूर्त से अन्त था@ मूर्त था
हर चीज की जगह थी
हर चीज का समय था
इस दिक्काल सीमा से परे हर चीज भ्रम थी@ तृष्णा थी
भ्रम से@ तृष्णा से असहिष्णुता थी@ विद्वेष था
सा थी@ प्रतिशोध था
मन से अनन्त था@ अमूर्त था
अनन्त से@ अमूर्त से सहिष्णुता थी@ प्यार था
दया थी@ क्षमा थी
मन से मूल था@ आदर्श थे
मूल्य की निष्ठा थी@ आदर्श की रचना थी
वही मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती थी
वही आवेगों को सजाती थी संवारती थी
वही रचनाओं की रहबर थी रहनुमा थी
मन से मनुष्य थे
हममंे से कितने थे ?
प्रकृति नहीं करती अपनी पुनरावृत्ति
उसकी हर सृष्टि है नयी@ अनोखी
अनेक जीवन हैं सृष्टि में
फिर भी कुछ तो अनोखा है हमारे जीने में ?
मन ही उसका बेनजीर तत्व है
कितनी प्रजातियां आयीं और लुप्त हो गयीं
मनुष्य तुम बचना अपने मन को बचाना
नाकामयाबियां@ शानदार नाकामयाबियां
मन का निषेध नहीं@उसके होने का आगाज हैं
शारीरिक आवेगों की मंजिल है कामयाबी
मस्तिष्क की व्याख्या@ उसकी कसौटी है कामयाबी
कामयाबियों के शिखर पर नहीं ठहरता है मन
नाकामयाबियों का निर्वाचित प्रदेश है मन
आज
अहं जब आहत है
चिŸा जब अस्थिर है
बुद्धि जब छीजने लगी है
मन को साधना है
परो हि योगो मनसः समाधिः 30

आओ
यज्ञ की अग्नि प्रज्वलित करो
मैं सूर्य और संज्ञा की संतान
वैवस्वत मनु
आज मन की बलि दूंगा
आज सारे दुष्कर्म मेरे हैं
सारी दुरूक्तियां मेरी हैं
सारी दुर्भावनाएं मेरी हैं
ब्रह्मा तुम्हारा अन्धकार मेरा है
युधिष्ठिर तुम्हारा झूठ मेरा है
दुर्योधन तुम्हारा सच मेरा है
धन तुम्हारी कामना मेरी है
सŸाा तुम्हारा अत्याचार मेरा है
सभ्यता तुम्हारा पाखण्ड मेरा है
प्रकृति तुम्हारा मनुष्य मेरा है
आज मेरा मन प्रायश्चित करता है
और अपनी बलि देता है
आओ प्रेयसी
यज्ञ की अग्नि प्रज्वलित करो@ मंत्र पढ़ो
सत्यं दया तपः शौचं तितिक्षेक्षा शमो दमः ।
अहिंसा ब्रह्मचर्यं च त्यागः स्वाध्याय आर्जवम्।।
संतोषः समदृक् सेवा ग्राम्येहोपरमः शनैः ।
नृणां विपर्ययेहेक्षा मौनमात्मविमर्शनम् ।।
अन्नाद्यादेः संविभागो भूतेभ्यश्च यथार्हतः ।
तेष्वात्मदेवताबुद्धिः सुतरां नृषु पाण्डव ।। 31
हजार अंगोंवाले पुरूष की बलि से सृष्टि हुई जगत की
दस मस्तिष्कवाले दशानन की बलि से सृष्टि हु ई पुरूषोत्तम की
एक मेरे मन की बलि से सृष्टि होगी विश्वमन की
एक मन की बलि से विश्वमन था
विश्वमन से विश्वदेव थे
हैलो, क्या यहां कोई विश्वमानव है ?
मृत्यु की अनेक कहानियां थीं
लेकिन मेरी तो जीवन की कहानी थी
मृत्यु की अनेक संभावनाएं थीं
लेकिन मैं जीवित था
मृत्यु की अनेक व्याख्याएं थीं
लेकिन मेरी तो जीवन की व्याख्या थी
हर चीज का अन्त था
लेकिन मेरी कविता तो अनन्त की कविता थी?

(मई, 1992)