भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

मन का आंगन सूना है / राम लखारा ‘विपुल‘

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

जब से दूर हुए तुम हमसे
मन का आंगन सूना है।

तुम संग जीवन रंग बिरंगा
तुम बिन कितना सादा है।
सुधियों की आवाजाही में
उपजी कितनी बाधा है।
खुशी हो गयी आधी तुम बिन
गम का हिस्सा दूना है।
जब से दूर हुए तुम हमसे
मन का आंगन सूना है।

सच कहते है आग बुरी है
सबको जलना पड़ता है
लेकिन जीवन नाम इसी का
फिर से फलना पड़ता है
इस अग्नि ने सूखें के संग
हरियाली को भूना है
जब से दूर हुए तुम हमसे
मन का आंगन सूना है।

सारे मुक्तक मंत्र हुए हैं
गीत भजन में निखरे हैं।
कविताओं के पुष्प दुःखों के
कल्पवृक्ष से उतरे हैं।
इस साधू मन के भीतर ही
एक धधकता धूना है।
जब से दूर हुए तुम हमसे
मन का आंगन सूना है।