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मन का दीपक / कुमार रवींद्र

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मन का
दीपक जले
तभी कुछ होगा, भाई
नकली है यह
बाहर-बाहर का उजियारा -
काम न देगा
धूप-छाँव का खेला रचकर
सूरज हमें दिखाता ठेंगा
उसके भीतर
जोत भरी जो
अग-जग में है वही समाई
उसी जोत के जादू से है
इन्द्रधनुष होतीं इच्छाएँ
वनखंडी में उसे बांटती फिरतीं
देखो, सूखी हवाएँ
दिया नेह का
जब जलता है
हो जातीं साँसें कविताई
सुनो, हाट के उजियाले में
छिपा हुआ है घना अँधेरा
छल-प्रपंच जो रचे वक्त ने
उन्हें लगाने दो मत फेरा
चकाचौंध
जो बाहर की यह
उसमें सबने ठोकर खाई