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मन की रास / रामकृपाल गुप्ता

दौड़ चलो
राह बना लो।
चलना ही जब
रूक-रूककर फिर
इन्तजार किसका क्या कराना
मन की रास सँभालो
दौड़ चलो।
राह न हो ता राह बना लो।
माँ के आँसू रोक न पाये
दुल्हन चली पिया के घर
बरस थकीं अँखियाँ बाबुल की
मगर नहीं पिघला पत्थर
चढ़ी पालकी पहिन चुनरिया
सिसके बिरना का अन्तर
मत रोको सखियाँ बचपन की
बुला रही है नयी डगर।
चली अकेली पिया नगरिया
सँभलों रे सँभालो
दौड़ चलो।
राह न हो ता राह बना लो।