भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

मन रमि गेलै यार / करील जी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

राम भजन में मन रँगि गेलै॥धु्रव॥
जनम-जनम के हियरा के काई।
एके लहरिया में बहि गेलै यार॥राम.॥
अब न सोहाबै ई जग के बजरिया।
मोरा लेखें सगरो उजरि गेलै यार॥राम.॥
पचरंग चोला सफल भेलै, अब मन।
राम मिलन लागि उमगि गेलै यार॥राम.॥
मोह-निसा में सूतल रहलौं।
अब मन हमरो जगि गेलै यार॥राम.॥
तीत विषय रस त्यागि ‘करीलवा’।
प्रभु-पद पंकज पगि गेलै यार॥राम.॥