भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

मह्व मुझ-सा दमे-नज़्ज़ारा-ए-जानाँ होगा / मोमिन

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मह्व1 मुझ-सा दमे-नज़्ज़ारा-ए-जानाँ2 होगा
आईना आईन देखेगा तो हैराँ होगा

ऐसी लज़्ज़त3 ख़लिशे-दिल4 में कहाँ होती है
रह गया सीने में उसका कोई पैकाँ5 होगा

बोसा-हाये-लबे-शीरीं6 के मज़ामीं7 में न क्यों
लफ़ज़ से लफ़्ज़8 मेरे शे'र की चस्पाँ9 होगा

कह सुनाते हो कि है हिज्र में जीना मुश्किल
तुमसे बेरहम पे मरने से तो एहसाँ होगा

क्योंकर उम्मीदे-वफ़ा10 से हो तसल्ली दिल को
फ़िक्र है यह कि वह वादे से पशेमाँ11 होगा

आख़िर उम्मीद सी से चारा-ए-हरमाँ12 होगा
मर्ग13 की आस पे जीना शबे-हिज्राँ होगा

बात करने में रक़ीबाँ14 से अभी टूट गया
दिल भी शायद उसी बद्-अहद15 का पैमाँ होगा

शब्दार्थ:
1. मगन, 2. प्रेयसी के दीदार के समय, 3. मज़ा, 4. दिल में होने वाली पीड़ा, 5. तीर, 6. रसीले होंटों का चुम्बन, 7. संबंधित लेख, 8. शब्द, 9. चिपका हुआ, 10. प्यार की उम्मीद, 11. शर्मिन्दा, 12. तकलीफ़ों का अंत, 13. मौत, 14. दुश्मन, 15. वादा न निभाने वाले