भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
  रंगोली
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार
Roman

मऽरो संसार बुझ गयो रे मऽरो राम / पँवारी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

पँवारी लोकगीत   ♦   रचनाकार: अज्ञात

मऽरो संसार बुझ गयो रे मऽरो राम
कहा गयो मऽरोऽ राम रे...
कसो दोड़ऽ गयो मखऽ एखली खऽ मऽरा राम रे
कोका भरोसा जीहू मऽरा राम रे...
तोरा नान्हा-नान्हा पोर्या हनऽ खऽ
कोनऽ देखे मऽराऽ राम रे...
खेत पऽ जानऽ की बखत भई
उठनऽ मऽरा राम रे...
मखऽ काहे छोड़ दी तोनऽ मऽरा राम रे...
मखऽ भी उठाय लेतो अपना संग मऽ मऽराऽ राम रे...
मऽ कसी-कसी काटहूँ जिनगी मऽराऽ राम रे...
तोरा राम लक्षमन जसाऽ बेटा हनऽ
कोका भरोसा जिहे मऽरा राम रे...
मऽराऽ आगऽ पाछअ कुई देखन वाला नहाय (नोहय)
मऽरा राम रे...
ऐनी सावित्री खऽ काहे छोड़ दी मऽराऽ सत्यवान रे...
ऐनी जिनगी को दुखड़ा कोखऽ सुनाहूं मऽराऽ राम रे...
तोरी नातिन दादा-दादा करय मऽराऽ राम रे...
उनसी....आसी ते बोल ले मऽराऽ राम रे...
तोरा बिही समदी हन आया तोरी देवढ़ी मऽरा राम रे...
उनसी....बात ते कर ले मऽरा राम रे...