भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

माँ का ख्वाब / गोपालप्रसाद रिमाल / सुमन पोखरेल

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

माँ, वह आएगा भी?
"हाँ, बेटा, वह आएगा।
वह सुबह का सूरज की तरह रोशनी बिखेरते हुए आएगा।
उसकी कमर पे शबनम-सा जगमगाता हुआ
तुम एक हथियार देखोगे,
उसी के सहारे लड़ेगा वह अधर्म से !
उसके आने पे
पहले तो तुम ख्वाब समझकर इधर-उधर टटोलोगे,
मगर वह बर्फ और आग से भी ज्यादा काबिल-ए-एहसास हो कर आएगा"

सच माँ?

"हाँ, तुम्हारा पैदा होते हुए तुम्हारा मासूम चेहरे पर
उसी की साया देखने की तमन्ना थी मुझे।
तुम्हारी मुस्कुराहट पे उसी का ख़ूबसूरत तस्वीर,
तुम्हारे तोतले शब्दों पे उसी की मद्दम आवाज,
मगर अब पता चला कि
उस मनमोहक गाने ने तुम्हेँ अपना बाँसुरी नहीं बनाया।
जवानी भर मेरा ख्वाब था कि वह तुम ही होगे।"

जो भी हो, वह आएगा;
माँ हूँ मैं, सारे सिर्जनशक्ति की बोली बन के कह सकती हूँ
वह आएगा
ये मेरा कोई आलसी ख्बाब नहीं है।

उस के आने के बाद
तुम मेरी गोद में आकर ऐसे सर नहीं छुपाओगे,
सत्य को तुम
कहानियाँ सुनने जैसे ऐसे खिँचे चले आ के नहीं सुनोगे,
तुम उसे खुद ही देख सकोगे, सह सकोगे और कबुल कर सकोगे;
तुम्हे जंग मे जाते हुए
मै इस तरह सब्र सिखाती नही होउँगी
तुम लाख मनाने पर भी न माननेवाला माँ का दिल को सांत्वना दे के जाओगे;
मुझे इस तरह किसी बीमार को सहलाने के जैसे तुम्हारे बाल सहलना नही पड़ेगा |
देखते रहो, वह आँधी हो के आएगा
तुम पत्ता हो के उसके पीछे भागोगे !

सालों पहले उसका जीवनलोक से गिरकर चाँदनी-सा बिखरते वक्त
सारे जडता सगबगा उठे थे, बेटे;
वह आएगा, तुम जागोगे !"

क्या वह सचमुच आएगा माँ?
उस के आने की उम्मीद
मधुर उषा चिडियों के गले को गुदगुदाती है जैसे
वैसे ही मेरे दिलको गुदगुदा रही है!

'हाँ वह आएगा,
वह सुबह का सूरज की तरह रोशनी बिखेरते हुए आएगा।
अब मैं उठी, मैं चली।"


"मगर जवानी भर मेरा ख्वाब था कि
वह तुम ही होगे।"