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माँ की पाती बेटे के नाम / राजेश श्रीवास्तव

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बेटा गनेस तेरा खत मिला,
तेरी ममताभरी मजबूरियाँ मिलीं
गाँव और सहर के बीच की बढ़ती हुई दूरियाँ मिलीं।
तू मेरी चिंता मत कर बेटा,
आराम से सहर में रह,
अच्छा ओढ़-पहन, कमा-खा,
इन बूढ़ी साँसों का क्या है,
राम जाने कब आ जाए बुलावा।

जब याद भौत सताती है
तो आँसुओं के मोती आँखों में भर लेती हूँ,
और थरथराते सीने पर
चकिया का भारी पत्थर धर लेती हूँ।
एक बात कहूँ बेटा,
इसे सठियाई सीख समझ मत भुलाना,
अपने बच्चों को तू
कभी बड़ा सहर मत दिखाना।
नहीं तो तेरा सहर भी,
उन्हें मेरे गाँव-सा छोटा लगेगा,
फिर तू कब तक और कहाँ तक,
उनके पीछे भगेगा।

तू तो पढ़ा-लिखा है बिटवा,
मुझ अनपढ़ की तरह, पगलाए सपने मत पालना,
बच्चों को सहर में सहर की तरह ही ढालना,
क्योंकि गाँव से पलकर
जो सहर तक जाते हैं,
जिन गलियों में वे खेले थे,
जिस मिट्टी में वे लोटे थे,
वही सब उन्हें पिछड़े और बदबूदार नज़र आते हैं।
अब तो तू नदियाँ देखता होगा,
यहाँ तेरी याद में बिलखते हैं बंबा और नहर,
तेरे बाबू को काल खा गया बेटा
और तेरी माँ को तेरा सहर।
बुखार से तो अब लड़ा नहीं जाता,
पर गाहे-बगाहे हर किसी से बिन बात लड़ जाती हूँ,
आँखें भी ऐसी धुंधला गई हैं
कि मक्की की रोटी समझ
अक्सर चूल्हे की आग पकड़ जाती हूँ।

अनपढ़-गँवार निरच्छर हूँ,
मेरी कोई बात बेटा, दिल से न लगाना,
चाहे किसी बहाने ही सही,
तू कुछ दिन को गाँव जरुर आ जाना।
तू घबरा मत बेटा,
कसम खाती हूँ मुरली वाले की
और तू जानता है मैं निभाऊंगी,
मैं तेरी माँ हूँ,
अपने जीते जी तेरे किसी दोस्त को न बताऊंगी।

महरी, मालन, नौकरानी या दूर की रिश्तेदार,
तू जो चाहे कह देना,
पर बेटा, मैंने तेरी पसंद के
देसी घी के लड्डू बना कर रखे हैं,
सहर जाने से पहले, सबकी नज़र बचाकर,
चुपचाप उन्हें रख लेना।