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माँ की हथेलियाँ / महेश सन्तोषी

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आसपास के बँधे घरों में जो वर्षों बेलती सेंकती रही रोटियाँ;
आज हमें दिन भर याद आती रहीं अपनी माँ की थकीं हथेलियाँ;
रोटियों और हाथों के बीच की दूूरिया-नज़दीकियाँ,
कई त्रासदियों से भरी नम उम्र की पिछली गलियाँ!

पहले स्कूल से लेकर आखि़री कॉलेज तक
कुछ ऐसे ही गुजरा शुरुआती ज़िन्दगी का सफ़र;
सुबह से बनाते रहे मन्सूबों, मंज़िलों के लिए पुल,
शाम को लौटे तो वही अभावों से भरा, बिखरा घर;
रात को किताबों के आधे सफों पर अनजानी काली स्याही,
आधे सफों पर आत्मविश्वासों से झरते नई रोशनियों के निर्झर!

फिर एक दिन पूरा हुआ, सूरज की एक बेटी बनने का हमारा हौसला,
हमने पाट ही लिए रोटियों और हथेलियों के बीच के फासले;
कोई बड़ा दिन था, वह बड़ी-सी नौकरी थी,
जब हम घर आकर अपनी माँ से गले मिले;
हमने माँ की हथेलियाँ चूमीं, पलकों से, प्राणों से छू लीं,
हमें लगा उन हथेलियों से होकर ही आये, हम तक रोशनियों के सारे काफ़िले!