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माटी कोरे गेल छिनरो, पार गंगा हे / मगही

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मगही लोकगीत   ♦   रचनाकार: अज्ञात

माटी कोरे[1] गेल छिनरो[2] पार गंगा हे।
गजनवटा[3] में चोरवले[4] आयल सोरह गो[5] भतार हे॥1॥
घर के भतार पूछे, कवन-कवन जात[6] हे।
चार गो त जोलहा-धुनिया, चार राजपूत हे॥2॥
चार गो त मुसहर[7] बड़ मजगूत[8] हे।
भले[9] छिनरो, भले कोरे[10] गेल[11] हे॥3॥

शब्दार्थ
  1. कोढ़ने, खनने
  2. छिनाल, छिन्ना$नारी
  3. स्त्री की पहनी हुई साड़ी के नीचे का भाग
  4. चुराकर
  5. संख्या, अदद
  6. जाति
  7. चूहा मारकर खाने वाली निम्न जाति, मूषकहर अथवा मूषहर
  8. मजबूत
  9. अच्छा, खूब
  10. मिट्टी। कोड़ने
  11. गई