(राग जंगला-ताल कहरवा)
मानव-जीवनका है पावन एकमात्र यह लक्ष्य महान-
सत्कर्मोंसे सदा पूजकर, ‘पाना परम-अर्थ भगवान’॥
इसे भूलकर, भोग-परायण हो, करता जो नित्य प्रमाद।
लक्ष्य-भ्रष्ट हो, करता वह निज भावी जीवनको बरबाद॥
व्यर्थ-अनर्थ क्रियाओं में फँस, करता नित्य नये वह पाप।
खोकर जीवन, वह कुबुद्धि पड़ता नरकोंमें अपने-आप॥