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मायूस उसके दर से हो अपनी तौहीन से / पवनेन्द्र पवन

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मायूस उसके डर से हो अपनी तौहीन से
जाने कहाँ गए मेरे सपने हसीन -से

मुझको भी मानता जहाँ सत्यवादी युधिष्ठिर
कह पाता मैं भी झूठ जो पूरे यक़ीन से

वो यार जिसकी याद में घुट-घुट के हूँ मरा
निकला है बन के साँप मेरी आस्तीन से

साया थी सर पे जो, उड़ी जब आँधियों के संग
कितने लोग कट मरे छप्पर की टीन से

चंगर[1] को छोड़ कर पलम[2] में आ पता चला
बंजर क़दीम ठीक थी नहरी ज़मीन से


शब्दार्थ
  1. हिमाचल प्रदेश के ज़िला कांगड़ा का वो क्षेत्र जहां पानी का अभाव रहता है
  2. पानी का कटोरा, अर्थात ज़िला कांगड़ा का वो क्षेत्र जहाँ पानी प्रचुर होता है, कांगड़ा की पालमपुर तहसील का नाम करण इसी शब्द से है