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मासूम दृश्य / दीपाली अग्रवाल

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 जीवन के एक हिस्से में जहां संसार
संभवतः फिर किसी युद्ध की तैयारी में है,
वैश्विक नफ़रतों के व्यापार फल फूल रहे हैं,
धर्म की चटाई पर जुए की बिसातें बिछी हैं,
और चेहरे पर लगे मुखौटे अब स्थाई हो गए हैं,
वहां कतिपय ही दृश्य मासूम बाकी हैं
जैसे सुखद है आदम के बच्चों का पहला क्रंदन,
किसान के बंजर चेहरे पर हंसी की खेती,
प्रेमी के द्वारा कपाल पर दिया पहला चुम्बन,
ईश्वर के दरवाज़े पर की गई प्रार्थना कि
'सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे संतु निरामया'
कितना सुखद है भोर के एक प्रहर में
बस्ता टांगे आज को भविष्य की ओर जाते देखना
कतिपय ही दृश्य मासूम बाकी हैं वहां
जहां संसार फिर किसी युद्ध की तैयारी में है