पहले नज़रों से अपनी
मेरे चेहरे पे
मास्क बुनता है
फिर जो मैं कहता हूं
उन बातों को
ना समझता है, ना सुनता है
मेरे दिलमें
कुछ दिनों से
वो जो रहता है
बला का ज़िद्दी है
ख़ुद बाहर नहीं आता कभी
मुझे अंदर बुलाता है
प्यार करता है इशारों से मुझे
और मास्क के अंदर
मुस्कुराता है ॥