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मिठाई न होती / रमेश तैलंग

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रुई से भरी जो रजाई न होती,
कड़ी ठंड से फिर रिहाई न होती ।

बिस्तर पे लगता बरफ़ जो बिछी हो,
ज़रा देर को नींद आई न होती ।

अजी, कोल्ड-फ़ीवर रुला देते हमको,
मम्मी ने दी जो दवाई न होती ।

कड़वी दवा भी गले न उतरती,
अगर उसके ऊपर मिठाई न होती ।

मिठाई भी कर देती बच्चू, कबाड़ा,
अगर ’हाजमोला’ ये खाई न होती ।

अहा ! इतना ज़्यादा मज़ा भी न आता,
ग़ज़ल ये जो सबको सुनाई न होती ।