भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

मिरे ठहराओ को कुछ और भी वुसअत दी जाए / सालिम सलीम

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मिरे ठहराओ को कुछ और भी वुसअत दी जाए
अब मुझे ख़ुद से निकलने की इजाज़त दी जाए

मौत से मिल लें किसी गोशा-ए-तन्हाई में
ज़िंदगी से जो किसी दिन हमें फ़ुर्सत दी जाए

बे-ख़द-ओ-ख़ाल सा इक चेहरा लिए फिरता हूँ
चाहता हूँ कि मुझे शक्ल-ओ-शबाहत दी जाए

भरे बाज़ार में बैठा हूँ लिए जिंस-ए-वजूद
शर्त ये है कि मिरी ख़ाक की क़ीमत दी जाए

बस कि दुनिया मिरी आँखों में समा जाएगी
कोई दिन और मिरे ख़्वाब को मोहलत दी जाए