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मिस्टर के की दुनिया: पेड़ और बम-४ / गिरिराज किराडू

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अलंकारहीन भाषा में
जिसमें कोई कपट न हो
कोई रूपक न हो
क्षमा मांगनी है तुमसे

क्षमा करो कि प्रेम करता हूँ तुमसे
यूं खो तो तुम्हें तभी दिया था जब कहा था प्रेम करता हूँ तुमसे