भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

मीर हो मिर्जा हो मीरा जी हो / नून मीम राशिद

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मीर हो मिर्ज़ा हो मीरा जी हो
ना-रसा हाथ की नम-नाकी है
एक ही चीख़ है फ़ुर्कत के बायाबानों में
एक ही तूल-ए-अलम-नाकी है
एक ही रूह जो बे-हाल है जिंदानों में
एक ही क़ैद तमन्ना की है

अहद-ए-रफ़्ता के बहुत ख़्वाब तमन्ना में हैं
और कुछ वाहमे आइंदा के
फिर भी अँदे वो आईना है जिसमें गोया
मीर हो मिर्ज़ा हो मीरा जी हो
कुछ नहीं देखते हैं
महवर-ए-इश्‍क की ख़ुद-मस्त हक़ीक़त के सिवा
अपने ही बीम ओ राजा अपनी ही सूरत के सिवा
अपने रंग अपने बदन अपने ही क़ामत के सिवा
अपनी तन्हाई-ए-जाँ-काह की दहशत के सिवा !

दिल-ख़राशी ओ जिगर-चाकी ओ ख़ूँ-अफ़शानी
हूँ तो ना-काम पे होते हैं मुझे काम बहुत
मुद्दआ महव-ए-तमाशा-ए-शिकस्त-ए-दिल है
आइना-ख़ाने में कोई लिए जाता है मुझे
रात के फैल अँधेरे में कोई साया न था
चाँद के आने पे साए आए
साए हिलते हुए घुलते हुए कुछ भूत से बन जाते हैं
मीरा हो मिर्ज़ा हो मीरा जी हो
अपनी ही ज़ात की ग़िर्बाल में छन जाते हैं !
दिल ख़राशीदा हो ख़ूँ दादा रहे
आइना-ख़ाने के रेज़ों पे हम इस्तादा रहे
चाँद के आने पे साए बहुत आए भी
हम बहुत सायों से घबराए भी
मीर हो मिर्ज़ा हो मीरा जी हो
आज जाँ इक नए हँगामे में दरा आई है
माह-ए-बे-साया की दाराई है
याद वो इशरत-ए-ख़ूँ-नाब किसे ?
फ़ुर्सत-ए-ख़्वाब किसे