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मुक्तक द्वादशी / सुनीता पाण्डेय 'सुरभि'

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1

अँधेरी रात आई है, उजाला सुब्हो आना है।
न घबरा गम के बादल से ये बादल छट ही जाना है।
न हो मायूस ऐ दिल वह रखेगा आबरू तेरी-
कि आगे जिसके सर अपना झुकाता ये ज़माना है।

2

जाने किस मोड़ पर है घर मेरा।
खत्म होता नहीं सफर मेरा।
सर कहीं अब नहीं झुकाऊँगी-
दर तेरा ही रहेगा दर मेरा।

3

मेरी जान तुम हो, तुम्हीं महजबीं हो।
बहुत खूबसूरत बहुत ही हसीं हो।
तुम्हें पूजता हूँ मैं देवी समझ कर-
मेरे मन के मंदिर की मूरत तुम्हीं हो।

4

इन आँसुओं का अपना फसाना नहीं होता।
गम देने वाला कोई बेगाना नहीं होता।
अपने ही तोडते हैं बहाने बना के दिल-
पर दिल को जोडऩे का बहाना नहीं होता।

5

मेरे अंतस को जीवन का यही इक सार भाया है।
तुम्हारे मन के आँगन का मुझे संसार भाया है॥
नहीं सोना, नहीं चाँदी, नहीं हीरा, नहीं मोती-
तुम्हारी बाँहों का साजन मुझे ये हार भाया है।

6

नित्य पर्याय बन कर करुँ कल्पना।
मैं क्षितिज पर सजाऊँ नई अल्पना।
प्यास लेकर पपीहे की मैं उम्र भर-
अपने स्वाती की करती रहूँ अर्चना।

7

बसी है दुनिया मेरी बस तुम्हारी एक चाहत में।
तुम्हीं शामिल हो मेरी ज़िन्दगी की हर नजाकत में।
खुदा से सिर्फ़ माँगी हैं तुम्हारे वास्ते खुशियाँ-
उठेंगी मेरी नज़रें बस तुम्हारी ही इबादत में।
 
8

स्वप्न आँखों में सजाकर क्या करूँगी।
प्रीत की पायल बजाकर क्या करूँगी।
आज तक विरहाग्नि उर की बुझ न पा ई-
तब मुकुर को लख, लजाकर क्या करूँगी।
 
9

हमें किसी की आदत क्यों हो जाती है।
बिन चाहे ही हर पल याद सताती है।
बसा तसब्बुर में मेरे वह हमराही-
अब ये दुनिया पल भर नहीं सुहाती है।

10

ज़िन्दगी का हर सफर जैसे सुहाना हो गया।
जब से मेरा दिल ये उसका आशियाना हो गया।
अब नहीं रहता है इक-पल होश में मेरा जिया-
प्यार में उसके मेरा ये दिल दीवाना हो गया।

11

जब अँधेरे मुझे रास आने लगे।
ख़्वाब ही तब उजाले दिखाने लगे।
हाथ थामा तभी मेरा विश्वास ने-
जिन्दगी हम तभी से सजाने लगे।

12

हम न बोलेंगे कभी, तुम याद आया मत करो।
 है कसम तुमको हमारी, यों रुलाया मत करो।
जान पर मेरी बनी, ये अश्क़ भी रुकते नहीं-
दर्द यों देकर सनम! मुझको सताया मत करो।