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मुगती / मोहन पुरी

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सूरज हांक दियो है रथ
समै रा कुरुखेत में
आवो! आपां रोजीनां री भांत
मिल’र फेर लड़ां....
खूंखार जिनावरां री ज्यांन....
उणी ठौड़... उणी दिसा में।
हरेक
सांझ रै बगत
आपणी बचकानी हरकतां रो
तरोताजा हाल सुणावैला
रेडियो अर टेलीविजन।
ओ जिको है.... वो जिको है
नीं थारो.. नीं म्हारो
सदियां रा मिथक
आंख री पलकां ऊगता रैवै,
अर आथमता रैवै।
....पण फेर बी
जद आपां निष्प्राण होय’र रळ जावांला
पृथ्वी, आकास अर पाताळ रा गरभ मांय....
आपणी पृष्ठभोम रा
हाडक्यां खोदैली, आवण वाळी पीढियां,
तेल अर कोयला री खोज में....।
बठै सूं एक नवी कथा बणैली
अर आपां
राम-रावण रा चरित्रां री ज्यांन
बस जावांला आगली पीढियां री ओळूं
स्मृति पटल पे।
....या फेर यूं हो सकै है कै
आपां बण जास्यां....
भूत अर पिसाच
ज्यांकी मुगती,
सृष्टि रै आखरी पल तांई
नीं हुय सकैला....?