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मुझसे नज़रें चुराने लगे / सुनीता पाण्डेय 'सुरभि'

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आप क्यों मुझसे नज़रें चुराने लगे।
आँसुओं को भी मुझसे छुपाने लगे॥

क्या यही प्रीत की रीत है बोलिए,
भाग्य में ये विरह गीत है बोलिए.
क्यों समझने लगे हो बेगाना मुझे-
क्या यही आपकी जीत है बोलिए.
आपने हाले दिल मेरा देखा नहीं-
फासले किसलिए यों बढ़ाने लगे॥


कुछ शरारत मेरी, कुछ हकीकत मेरी,
ये समझ लो कि है ये नसीहत मेरी।
साथी हो के मैं तुमको ग़लत राय दूँ-
ऐसी जुर्रत नहीं है, न फितरत मेरी।
बात मैंने ग़लत क्या कही है सनम-
आप क्यों तिल को तूमाँ बनाने लगे॥

मेरा जख़्मे जिगर भी ज़रा देखिए,
जो अभी तक नहीं है भरा देखिए.
फिर से मैं जख़्म खाने को तैयार हूँ,
मेरा टूटा नहीं आसरा देखिए.
सोचती हूँ मैं, क्या हो गया आपको
आप क्यों मुझसे दामन बचाने लगे॥