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मुम्बई / विजय चोरमारे / टीकम शेखावत

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यहाँ हर रोज़ ही होता है कुम्भ मेला
स्टेशन दर स्टेशन
शाही स्नान का माहौल
कीड़े-मकोड़ों की तरह भीड़
चल रही है हवा के संग
पाप-पुण्य को दोराहे पर डाल
लोकल आती हैं... थमती है
भीड़ का रेला उतरता है
भीड़ का रेला चढ़ता है
लहराता है
लटकती देह
लटकी ही रहती है

थमती-साँसों के बीच बढ़ती भीड़ में
घुस जाएँ लगाकर सारी ताक़त
तब कहीं मिलती है
राह भीतर जाने की
एक चप्पल पैर में दूसरी प्लेटफ़ार्म पर
जेब से पेन ग़ायब
चश्मा बाल-बाल बच गया फिर भी डण्डी टूट ही गई
शर्ट के बटन हैं ग़ायब
जान सलामत बचने की ख़ुशी के साथ
आगे बढ़ रही है लोकल

यहाँ तो हर रोज़ ही है कुम्भ मेला
पूरे शरीर पर पसीने की धाराओं का नृत्य
लाखों जानें घुटती हैं रोज़
फिर भी किसी के घुटकर मर जाने की ख़बर
छपी नहीं है अख़बार में अब तक
और कोई मर भी गया
तब भी उसे
एक कौड़ी भी नहीं देती सरकार

जीओ तो मलबार हिल या नरीमन पॉइण्ट-सा
मरो तो दंगा-फसाद या बम विस्फोट में

अन्त में एक ही प्रार्थना :
लोकल के डण्डे पर
हाथ की पकड़ मज़बूत रहे
सुबह का निकला हुआ आदमी
रात में सही-सलामत घर पहुँचे !

मूल मराठी से अनुवाद — टीकम शेखावत