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मुर्दा नम्बर / विजय गुप्त

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बहुत कोशिशें कीं
नहीं सुन सका
टूटी हुई सिलाई वाली
क़िताब के पन्नों में
जैसे-तैसे अटके
धागों की पुकार;
समझ ही नहीं सका
वह ज़बान,
जिसमें;
डाल से टूटते हुए
पत्ते की चीख़ थी;
महसूस ही नहीं कर सका
कुचले हुए फूलों की
देह के घाव ।

अभी-अभी गिरी है
एक चिडि़या
ज़मीन पर,
दूर जंगल में कहीं
गिरा है कोई आदिवासी
नहीं देख सका,
आदिकवि की आँखों से कविता
दिल के ख़ून में डूब कर
जिन अक्षरों को
सुर्ख़ और ज़िन्दा
कविता होना था
वे बैंक एकाउण्ट के
मुर्दा नम्बरों में बदल गए ।